Posted November 2, 2007 by HariOm Group
Categories: Mantra

 

||Mahamrityunjaya Jap Yagya||

HariOm, Please be a part of Akhand Mahamrityunjay Japa for our Pujya Bapuji’s health and prosperity. For this we have to do japa on the night of Kaali Chaudas 8th November 2007 (one day before Kartik Amavasya- Deepawali). Please logon to http://hariomgroup.org/jap_yagya for more details .

For japa procedure details, please read below-

 

Click on above image- if you are unable to read it.

START TIME
6.00AM IST ON 08/11/07 (8th Nov’07)

PURNAHUTI
7.00 AM IST ON 09/11/07 (9th Nov’07)

Total Time
(25 HOURS JAP)

Download Mahamrityunjay Jap Excel Sheet

1. Every saadhak should start Jap before 05 minutes of the given time, & finish Jap after 05 minutes from the given time to ensure continuity.

2. If more saadhaks want to join the Jap, please start Jap with the specific time mentioned in the table for the specific zone.

3. Please note that you all should follow your given time mentioned above, don’t break on that or change your Jap timings.

4. Please spread this divine seva opportunity among your Gurubhai/Gurubahans.

5.Please email us your details on Hari Om Group (hariomgroup@gmail.com or motwaninaresh@yahoo.com).

6. If possible, please send us sms on( 00971505258358 -Dubai.) when you finish your Jap.

Tumhaare Pyaar ne Guruvar

Posted June 4, 2007 by HariOm Group
Categories: Sant Asaram Bapu, Shri Asharam Bapu, Video


Tumhaare Pyaar ne Guruvar, Humko Tumse Joda Hai

सबसे बड़ा आश्चर्य !!!

Posted May 1, 2007 by HariOm Group
Categories: Sant Asaram Bapu, Satsang, Shri Asharam Bapu

कोई दैत्य या यमराज हाथ पकड्कर आपको नरक में नही ले जायेगा। अन्तकाल में आपके चित्त की जैसी अवस्था होगी, आप आगे उसी ढंग की यात्रा करन लगोगे। जैसे पाप-वासना जोर पकड़ती है तो व्यक्ति शराब में सुख मानता है, जुऐं में सुख मानता है, पान मसाले में सुख मानता है। चोरी, बेईमानी, परस्त्रीगमन आदि में सुख मानता है क्योकि मति मर गई है।

अगर पुण्य जोर मारता है तो अपनी पत्नी होते हुए भी संयम से रहेगा। जप, ध्यान, सेवा, सुमिरन, दान, पुन्य करेगा। अपने ही पुन्य और पुन्य बढ़ाने की सद्‌बुद्धि देते है तथा अपने ही पाप और पाप बढ़ाने की दुर्बुद्धि देते है, मनुष्य स्वतन्त्र इसलिये है कि वह विवेक का आश्रय ले सकता है। भगवान को अपना और अपने को भगवान का मानकर उनके नाम का जप “ॐ ॐ श्री परमात्मने नमः, हरये नम करके अपना विवेक और जगायें तथा विवेक का आश्रय ले कर अशुभ से बचे। दृढ निश्चय होकर भगवान की तरफ़ लग जाये तो राग-द्वेष ढीलें हो जायेगें।

पुण्य उदय हुआ और पाप क्षीण हुआ इसकी पहचान क्या है ? ईश्वर की तरफ़ चलने का दृढ़ निश्चय हो गया तो समझ लो कि पुन्य उदय हो गया।

काया कच्ची (मिटने वाली) है, धन कच्चा है, मन चंचल है फ़िर भी आदमी अचल रहने के लिय प्रयत्न कर रहा है। काल उसका मखोल उड़ाता है कि मरने वाले शरीर और चंचल मन वाला मनुष्य स्थिर रहने की कैसी बेवकूफ़ी कर रहा है।

यक्ष ने धर्मराज युधिष्ठर को सवाल पूछा :”इस पृथ्वी पर सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है? ऐसा कौन सा आश्चर्य है जो सबको भुलावे में डालता है?”

तो युधिष्ठर ने कहा:
“संसार से रोज-रोज प्राणी यमलोक में जा रहे है, किन्तु जो बचे हुए है, वह सर्वदा जीते रहने की इच्छा करते है। इससे बढ़कर आश्चर्य और क्या होगा।”

श्री कृष्ण की गुरुसेवा

Posted April 13, 2007 by HariOm Group
Categories: Uncategorized

गुरु की महिमा अमाप है, अपार है । भगवान स्वयं भी लोककल्याणार्थ जब मानवरुप मे अवतरित होते है तो गुरुद्वार पर जाते है ।

Shri Krishna receiving instructions from His Sadguru

राम कृष्ण से कौन बडा, तिन्ह ने भि गुरु किन्ह ।

तीन लोक के है धनी, गुरु आगे आधीन ॥

द्वापर युग में जब भगवान श्री कृष्ण अवतरित हुए एवं कंस का विनाश हो चुका, तब श्री कृष्ण शास्त्रोक्त विधि से हाथ मे समिधा लेकर और इन्द्रियों को वश में रख कर गुरुवर संदीपनि के आश्रम में गये। वहा वे भक्तिपूर्वक गुरु की सेवा करने लगे । गुरु आश्रम में सेवा करते हुए, गुरु संदीपनि से भगवान श्री कृष्ण ने वेद-वेदांग, उपनिषद, मीमांसादि षडदर्शन, अस्त्र-शस्त्रविद्या, धर्मशास्त्र एवं राजनीति आदि की शिक्षा प्राप्त की । प्रखर बुद्धि के कारण उन्होने गुरु के एक बार कहने मात्र से ही सब सिख लिया । विष्णुपुराण के मत से चौसठ दिन में ही श्री कृष्ण ने सभी चौसठो कलाए सीख ली ।

जब अध्ययन पूर्ण हुआ, तब श्री कृष्ण ने गुरु से दक्षिणा के लिये प्रार्थना की: ” गुरुदेव! आज्ञा कीजिए, मैं आपकी क्या सेवा करू ?”

गुरु: “कोई आवश्यकता नही है ।”

श्री कृष्ण: ” आपको तो कुछ नही चाहिये, किन्तु हमे दिये बिना चैन नही पडेगा । कुछ तो आज्ञा करे ।

गुरु: “अच्छा जाओ, अपनी माता से पूछ लो । श्री कृष्ण गुरु-पत्नी के पास गये एवं बोले: “माँ ! कोई सेवा हो तो बताइये ।” गुरु पत्नि भी जानती थी कि श्री कृष्ण कोई साधारण मानव नही बल्कि स्वयं भगवान है, अतः वे बोली : “मेरा पुत्र प्रभाष क्षेत्र में मर गया है । उसे लाकर दे दो ताकि मै उसे पयपान करा सकू ।”

श्री कृष्ण :” जो आज्ञा ।”

श्री कृष्ण रथ पर सवार होकर प्रभाष क्षेत्र पहुचे और वहां कुछ देर ठहरे । समुद्र ने उन्हे परमेश्वर जानकर उनकी यथायोग्य पूजा की ।

श्री कृष्ण बोले: “तुमने अपनी बड़ी बड़ी लहरॊ से हमारे गुरुपुत्र को हर लिया था । अब उसे शीघ्र लौटा दो ।”

समुद्र: ” मैने बालक को नही हरा है, मेरे भीतर पान्चजन्य नामक एक बड़ा दैत्य शंख रूप मे रहता है, निःसन्देह उसीने आपके गुरुपुत्र का हरण किया है ।”

श्री कृष्ण ने तत्काल जल के भीतर घुसकर उस दैत्य को मार डाला, पर उसके पेट में गुरुपुत्र नही मिला । तब उस्के शरीर से पान्चजन्य शंख लेकर श्री कृष्ण जल से बाहर आये एवं यमराज की संयमनी पुरी में गये । वहाँ भगवान ने उस शंख को बजाया । कहते है कि उस ध्वनि को सुन कर नारकीय जीवों के पाप नष्ट हो जाने से वे सब वैकुंठ पहुँच गये । यमराज ने बड़ी भक्ति के साथ श्री कृष्ण की पूजा की और प्रार्थना करते हुए कहा: “हे लीलापुरुषोत्तम ! मै आपकी क्या सेवा करुँ?”

श्री कृष्ण :” तुम तो नही पर तुम्हारे दूत, कर्मवश हमारे गुरुपुत्र को यहाँ ले आये है। उसे मेरी आज्ञा से वापस दे दो । ‘तथास्तु’ कहकर यमराज उस बालक को ले आये । श्री कृष्ण ने गुरुपुत्र को, जैसा वह मरा था वैसा ही उसका शरीर बनाकर, समुद्र से लाये हुए रत्नादि के साथ गुरुचरणों में अर्पित कर के कहा, “गुरुदेव ! और भी जो कुछ आप चाहे, आज्ञा करे ।”

गुरुदेव : “वत्स ! तुमने गुरुदक्षिणा भली प्रकार से संपन्न कर दी । तुम्हारे जैसे शिष्य से गुरु की कौन सी कामना अवशेष रह सकती है ? वीर अब तुम अपने घर जाओ । तुम्हारी कीर्ति श्रोताओ को पवित्र करे और तुम्हारे पड़े हुए वेद नित्य उपस्थित और श्रवण रहकर इस लोक एवं परलोक में तुम्हारे अभिष्ट फल को देने मे समर्थ हो। गुरुसेवा का कितना सुन्दर आदर्श प्रस्तुत किया है श्री कृष्ण ने ! थे तो भगवान, फिर भी गुरु की सेवा उन्होने स्वयं की है ।

सतशिष्यों को पता होता है कि गुरु की एक छोटी सी सेवा करने से सकामता निष्कामता में बदलने लगती है, खिन्न ह्रदय आनन्दित हो उठता है, सुखा ह्रदय भक्ति रस से सराबोर हो उठता है । गुरुसेवा में क्या आनन्द आता है, यह तो किसी सतशिष्य से ही पूछकर देखे ।

निरोगी व श्री सम्पन्न होने के लिये

Posted April 13, 2007 by HariOm Group
Categories: Mantra, Sant Asaram Bapu, Satsang, Tips

ॐ हुं विष्णवे नमः

निरोगी व श्री सम्पन्न होने के लिये

इस मन्त्र की एक माला रोज जप करें,

तो

आरोग्यता और सम्पदा

आती हैं ।

( गुरुपूनम अमदावाद २००५ के बापूजी के सत्संग से )

चेतना के स्वर ( भाग-१ )*

Posted April 11, 2007 by HariOm Group
Categories: Sant Asaram Bapu, Satsang, Shri Asharam Bapu, Shri Sureshanand Ji, Video

चेतना के स्वर ( भाग-१ )
*Courtesy:www.hariomgroup.org

चेतना के स्वर ( भाग-२ )

Posted April 11, 2007 by HariOm Group
Categories: Uncategorized

चेतना के स्वर ( भाग-२ )
Courtesy:www.hariomgroup.org

चेतना के स्वर ( भाग-३ )

Posted April 11, 2007 by HariOm Group
Categories: Experience, Satsang, Shri Asharam Bapu, Shri Sureshanand Ji, Video

चेतना के स्वर ( भाग-३ )

Courtesy:www.hariomgroup.org

होली २००७ !!!

Posted March 12, 2007 by HariOm Group
Categories: Sant Asaram Bapu, Shri Asharam Bapu, Shri Sureshanand Ji, Video

ये कैसा हैं जादु समझ मे ना आया !!

Posted March 8, 2007 by HariOm Group
Categories: Uncategorized