ठगों से सावधान

 

– Pujya Sant Shri Ashram Bapuji Chandigarh 14th June 2013

परमात्मा अभी तक मिला नहीं…. इतनी देर कर रहे हैं| वो ही परमात्मा दुर्लभ लग रहा है, वो ही परमात्मा परे दिख रहा है, वो ही परमात्मा पराया लग रहा है । इसी का नाम है माया । जो हो नहीं और दिखा दे उसको बोलते हैं माया । अघटना पट्यसी यस्यसा माया, न रथा न रथसंयोगा । वहां रथ भी नहीं है, रथ का संयोग भी नहीं है, रेल भी नहीं है, रेलगाड़ी की पटरियां भी नहीं हैं फिर भी स्वप्ने में रेलगाड़ी और पटरियां और पैसेंजर सब बन जाता है । जगह भी नहीं है आपके घर में पटरियां बिछाने की, कैसे रेल गाड़ी चला लेते हैं ? ये माया है । अजमेर का दूध मीठा पी ले, आबू की रबड़ी खा ले, मुंबई नु हलवो ठण्डो, भरूच की सींग खा ले भाई, डाकोर के भजिये खा ले, हरिद्वार की हर की पौड़ी में नहा ले, प्रसाद ले ले, सब बना देता है ये आत्मदेव । कैसा आत्म सामर्थ्य है ? हीता नाम की नाड़ी है उसमें वो चैतन्य का स्फुरना स्वप्ने की दुनिया बना देता है ।

कबीरजी की युक्ति
  एक सुबह कबीरजी बहुत रोये, बहुत रोये| लोग आते थे सुबह-सुबह कीर्तन करते हुए कबीरजी के दर्शन करने । आज तो महाराज जी रो रहे हैं चुप ही नहीं हो रहे हैं, खूब हाथाजोड़ी की कि महाराज आप जैसे इतने महान संत, आपके संपर्क में हमारी जिंदगियां सवर गयीं । हम निर्दुख हो गए| आपको कौन से दुःख ने, कौन से व्यक्ति ने सताया है ? महाराज आप इतना रो रहे हैं । बोले- उसका उपाय कोई कर नहीं सकता । अरे महाराज ! हम करेंगे, बताओ आखिर क्या हुआ ? बहुत हाथाजोड़ी की, तो कबीरजी तो समझ के रो रहे थे, अभिनय कर रहे थे, अभिनय वाले को दुःख नहीं होता । हाय सीते ! सीते ! रामजी को दुःख थोड़े होता है । हाय भाई लक्ष्मण ! वो कबीर जी तो ऐसा रोये कि चुप कराने वाले ही रोने लग गए । आखिर हाथाजोड़ी की| महाराज! आपका रोना हम नहीं सह सकते, कुछ भी होगा हम आपके दुःख का अंत कर देंगे, बताओ । बोले- नहीं कर सकते हो । ‘एक बार बता तो दो’ । बड़ी लम्बी चली खींच-तान, कबीरजी ने देखा कि बराबर वक्त है बताने का । रोते-रोते कबीरजी ने बोला कि मैं रात को चिड़िया बन गया था, चिड़िया, मैं चिड़िया हूँ । मुझे रात को ‘मैं चिड़िया हूँ’ ऐसा लगा| बोले- महाराज! वो रात को लगा तो स्वप्ने में लगा| बोले- हाँ । अरे! बोले स्वप्ना झूठा होता है । कबीरजी ने कहा “ पागल हुए हो, स्वप्ना झूठा कैसे होता है ? चिड़िया बना उस समय भी दिखा और अभी भी याद है और ये जब चिड़िया बना था तब ये याद नहीं था कि मैं काशी में हूँ और मैं कबीर हूँ । चिड़िया के वक्त ‘मैं कबीर हूँ’ ये याद नहीं रहा था लेकिन कबीर के समय याद है कि मैं चिड़िया भी बना था । तो वो झूठा कैसे हुआ ? जब स्वप्ना झूठा है तो ये सच्चा कैसे हुआ ? अब ये सच्चा है तो स्वप्ना झूठा कैसे हुआ?” । लोगों की बुद्धि में ऐसा ज्ञान का प्रकाश धकेल दिया कि उस समय तो वो सच्चा लग रहा था और अब नहीं है लेकिन उसकी स्मृति तो है । लेकिन स्वप्ने में जो चीजें दिखती हैं वो उस समय सच्ची लगती हैं और जाग्रत की स्मृति भी तो नहीं होती । तो जो दिखता है वो सच्चा है तो स्वप्ने के वक्त स्वप्ना सच्चा है और जाग्रत में भी उसकी स्मृति रहती है और स्वप्ने के वक्त जाग्रत जगत की स्मृति नहीं रहती| ख़याल करो तो दोनों का करो न… इस जगत का भी| मेरे भाई ने यह कह दिया, इसने यह कह दिया, उसने वो कर दिया, जो स्वप्ने में भी नहीं रहता है, गहरी नींद में भी नहीं रहता उस जगत को तो सच्चा मानते रहे हो और स्वप्ने को झूठा मान रहे हो । मैं कैसे मानूँ ? तुम कैसे दुःख मिटाओगे ? कबीरजी की क्या कृपा रही होगी, लीला ! आखिर लोगों को सोचने के लिए मजबूर कर दिया, ऐसे धीरे-धीरे संस्कार डाल के पता चल गया लोगों को कि –
उमा कहूँ मैं अनुभव अपना सत्य हरिभजन जगत सब स्वप्ना । 
  हरि, जो हर वक्त है, हमेशा है, हर देश में है, हर काल में है, हर वस्तु में है, हर परिस्थिति में है वह हरि, चैतन्य । स्वप्ना आया चला गया लेकिन उसका द्रष्टा हरि है, गहरी नींद आई चली गयी लेकिन उसको जानने वाला वही का वही, जिसने स्वप्ना जाना है उसीने गहरी नींद जानी है और उसीने कल के जाग्रत को देखा है । जाग्रत नहीं है, स्वप्ने के समय जाग्रत नहीं है, गहरी नींद के समय स्वप्ना नहीं है और समाधी में तीनों नहीं हैं लेकिन समाधी को जानने वाला है, स्वप्ने को जानने वाला है, जाग्रत को जानने वाला है, नींद को जानने वाला है, वो कौन है ? वो ही तो आत्मदेव है । कितना साफ़ सुथरा, वो ही तो आत्मा है, चैतन्य है, परमेश्वर है, वही चित्रगुप्त है, गुप्त रूप से हमारे संस्कारों का चित्र उसी में आता है । चित्र, जैसे फोटोग्राफी के नही.. ऐसे संस्कार आ रहे हैं । 
 

शंकराचार्य के चार ख़ास शिष्य थे- सुरेश्वराचार्य, पद्मपादाचार्य, हस्तामलकाचार्य और तोटकाचार्य| तो तीन तो बड़े विद्वान् थे । और चौथा तो शंकराचार्य को साक्षात् ब्रह्म रूप मानता था| बस! गुरु की सेवा…, वो बर्तन माँझे, कपड़े धोये, ये करे, वो करे । मूर्ती के भगवान से तो ये जाग्रत भगवान हैं गुरु मेरे… खूब तत्परता से सेवा करे । तो पढाई लिखाई में इतना ध्यान जावे नहीं| तो तीन चेले आये.. बोले- गुरूजी पाठ शुरू करो । बोले- उसको आने दो तोटकाचार्य को| बोले- गुरूजी! वो तो क्या है ! वो तो बर्तन माँझे, झाड़ू लगाये और गुरु ब्रह्म रूप हैं, गुरु चेतन रूप हैं, गुरू आनंद रूप हैं, गुरु ब्रह्मा विष्णु हैं, वो ही रट लगायी है उसने तो । शंकराचार्य को हुआ कि इन मूर्खों को हम विद्वान हैं… ये अहं है । जिसको मान बहुत मिलता है न… उसको थोड़ा-सा अपमान भी चुभ जाता है| फिर वापिस मन मुखता के घोड़े पे चढ़ के जा के गड्डे में गुलाटे खाता है । तो तीनों की मनमुखता थी । अरे ! बोले तोटक क्या कर रहा है ? दौड़ता हुआ आया…, जल्दी आ ! तो हाथ में बर्तन था और राख थी, गुरूजी का बर्तन माँझ रहा था । बोले- ये जो पढ़ने वाले हैं… वो श्लोक बोलता आ और जो पढ़ चुके हैं वो भी बोलो । तोटकाचार्य के हाथ में तो झूठा बर्तन था और राख थी, जीव्हा पर गुरु कृपा की सरस्वती बैठ गयीं । 
प्रातः स्मरामि हृदय संस्फुरात्म तत्वं, सत्चित्त सुखं परम गति तुरीयं । 
यद् जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति वेतिनित्यं, तदब्रह्म निष्कलहं न च भूत संगम ।।
  प्रातः काल हम वो सुमिरन करते हैं, आपकी पत्नी नींद में से नहीं जगा सकती, पति नींद में से नहीं जगा सकता, चौकीदार नींद में से नहीं जगा सकता, नींद में वो हरि तुम्हारा स्फुरना करता है, मन को जगाता है, तब आप जागते हैं । प्रातः स्मरामि हृदय संस्फुरात्म तत्वं, मेरे हृदय में जो आत्म तत्व संस्फुरना करवा देता है मन को, मैं उसका सुमिरन करता हूँ । जो प्राणों को भीतर खींच के लाता है फिर बाहर फेंकता है और बाहर गया हुआ प्राण नहीं आवे तो मर जावे आदमी लेकिन नीयति के अनुसार जितने प्राण लेने हैं, उतना खींचता है । ये कैसा समर्थ है ? स्टोव प्राइमस होता है न…पंप मार के प्राइमस जलाते हैं, स्टोव कंपनी का मालिक भी आ के खड़ा हो जाए, हाथाजोड़ी करे लेकिन स्टोव में थोड़ा-सा सुराख हो तो नहीं जलेगा । टायर में एक या आधा इंच का सुराख हो तो गाड़ी नहीं चलेगी लेकिन यहाँ तो नौ-नौ सुराख हैं और श्वास जाता आता है फिर भी गाड़ी चल रही है । ये कौन सा जादू है ! ये कैसा समर्थ आत्मदेव है ! प्रातः स्मरामि हृदय संस्फुरात्म तत्वं, सत्चित्त सुखं । वो सत है, चेतन है और सुखरूप है । सत्चित्त सुखं परम गति तुरीयं, परम गति है । यद् जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति वेतिनित्यं । जिसकी सत्ता से जाग्रत आता है चला जाता है, स्वप्ना आता है चला जाता है, सुषुप्ति आती है चली जाती है लेकिन वो जाता नहीं है । तदब्रह्म निष्कलहं, वो निष्कलंक है । न च भूत संगम, भूतों में तो परिवर्तन होता है, भूतों में तो नाश है, कलंकित हैं भूत, शरीर कितना भी किसी का हो कुछ न कुछ गड़बड़, मन किसी का भी हो कुछ न कुछ गड़बड़, बुद्धि किसी की भी हो कुछ न कुछ गड़बड़, पद कितना भी किसी का हो कुछ न कुछ गड़बड़, ये 2जी घोटाला तो कुछ भी नहीं, कई गड़बडें होती हैं । रावण की गड़बड़ देखो, हिरण्यकश्यपु की गड़बड़ देखो, श्रीकृष्ण के यदुवंशियों की गड़बड़ देखो, ये तो भूतों में तो ऐसे ही है लेकिन भूतों के आधार में कोई गड़बड़ नहीं है । मैं उसीका सुमिरन करता हूँ । प्रातः स्मरामि हृदय संस्फुरात्म तत्वं, जो हृदय में स्फुरित होता है उस तत्व का स्मरण । यद् जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति वेतिनित्यं, जाग्रत आता है, स्वप्ना आता है, सुषुप्ति आती है लेकिन वो ज्यों का त्यों रहता है ।
 

ऐसे ज्यों के त्यों रहने वाले के तरफ नज़र नहीं है और जो आता है जाता है, उसीको बोलते हैं कि गुरूजी चिड़िया तो झूठी थी, आप कबीरजी हैं, सच्चे हैं । कबीर सच्चे कैसे हैं ? स्वप्ने में कबीर दिखे नहीं और जाग्रत में तो चिड़िया भी याद आती है और आकृति भी याद आती है । लोगों की बुद्धि चकरा जाए, ऐसा ठोस द्रष्टान्त दे दिया । देखते हैं बाजी नू, बाजीगर नू कोई नहीं देखता । वो बाज़ीगर जो चैतन्य परमेश्वर है जो हमारा हितैषी है, कभी मरता नहीं, बिछड़ता नहीं, बेवफाई नहीं करता और नित्य अवस्थायें बदलती है फिर भी ज्यों का त्यों । वो बात नहीं चुभती और कोई बात ही नहीं है न जाने कैसी कल्पना करके, बात चुभा के खोपड़ी खराब कर रहे हैं, नास्तिक जैसा व्यवहार कर रहे हैं । किसी को कोई कह दे कि बापू ने याद किया तो दौड़ा-दौड़ा आता है लेकिन कुछ ऐसे महान पुरुष हैं कि बापू बोलते हैं कि आना बात करना, आवे ही नहीं, फुर्सत ही नहीं । 

कोप करे करतार तब देवे साधक को मनमुखता और जगत व्यवहार । जगत की तोल-मोल ये वो । 
तो तीन तो बड़े होशियार थे लेकिन श्रद्धालु तोटक के आगे तीनों नतमस्तक हो गए, तोटक तो बन गया तोटकाचार्य । बाकी के तीन भी फिर संभल गए, चारों शिष्यों को चार शंकराचार्य की गद्दियाँ मिलीं, जोशीमठ ये वो सब । नारायण हरि हरि ॐ हरि ॐ ॐ ॐ 
 

एक तो दुसंकल्प से बचें, दुष्ट विचारों से, दुष्ट संकल्पों से बचें । दुष्ट विचार, दुष्ट संकल्प से बचेंगे तो दुष्कर्म से भी बच जायेंगे । सुख के लिए दुष्विचार, दुष्कर्म करता रहेगा तो पतन होगा । दो दिन पहले एक शास्त्र में आया कि जो छुप के भी दुष्कर्म करेगा, छुप के भी कुछ ऐसे वैसे कर्म करता है तो उससे विक्षेप पैदा होगा, कर्मों की गति से । एक बड़ा प्रसिद्ध आदमी था उसको खाने का शौक था, नॉन वेजीटेरियन, झींगा, झींगा जब मारते हैं न… तो तड़प-तड़प के मरता है, खाने वाला तो मजा लेता है उस समय लेकिन किसी के दुःख के निमित्त आपको सुख मिलता है तो आपको बड़ा दुःख भोगने के लिए प्रकृति झोंक देती है । वो बड़ा आदमी अभी बिचारा तड़पता है । झींगा तो २ मिनट तड़पा होगा वो तो सज्जन कई वर्ष हो गए तड़प रहे हैं । बड़े प्रसिद्ध व्यक्ति थे । 
गहनों कर्मणा गतिः । 
 

अभी आप यहाँ चंदीगढ़ आश्रम में बैठे हैं, सत्संग सुन रहे हैं । भिवानी हरियाणा में साधवी रेखा और साधवी डॉली के सत्संग चल रहे हैं । १५०० लोग पाँच मिनट से ये सत्संग सुन रहे हैं । तो हरियाणा में भिवानी आश्रम साधकों ने बनाया है, एकांत के लिए भी अच्छा है और वैसे भी बड़ा सुन्दर है । उधर जाते हैं तो लगता है कि दुबारा जल्दी आयेंगे लेकिन ऐसे ऐसे आ जाते हैं । आज भी इधर लाइन लग गयी थी, हमारे को तारीख दो, हमारे को तारीख दो, हमारे को तारीख दो, जा नहीं पाते हैं लेकिन भिवानी वालों को अब रेखा साधवी के सत्संग के निमित्त २-३ बातें पक्की कर लेनी चाहिए । 
 

एक तो बुरे विचार आयें तो जैसे बच्चे के हाथ से कौआ कुछ छीनता है या कोई डरावनी चीज आ जाती है तो माँ माँ.. पिताजी! बाबाजी! चिल्लाता है । ऐसे ही बुरे विचार आयें तो हरि हरि हरि ॐॐॐ नारायण नारायण नारायण । बुरे विचारों की ताना-बूनी से जो चुभने की कल्पना हो जाती उससे आदमी बच जाता है । नहीं तो इसने ऐसा सोचा, ये सोचा, ऐसा कुछ होता नहीं है जितना जब दुष्कर्म दुःख देने को होता है न… तो अपना ही मन ऐसे-ऐसे बहाव, ऐसी-ऐसी कल्पना बना के दुखी होता रहता है । मेरे को ऐसा कहा था ! मैं थोड़े ऐसा हूँ ! मेरे लिए ऐसा सोचता है, वैसा सोचता है, उसने सोचा कि नहीं सोचा लेकिन तू अपने लिए आग जला कर खुद ही तप के मर रहा है, परेशान हो रहा है । मेरी सासू ने ऐसा सोचा होगा, बहु ने ऐसा किया, फलाने ने ऐसा किया, मैंने बहुत दुःख देखे, इसने ऐसा किया, अब वो जब देखे तब देखे.. याद करके परेशान हो रहे हैं । 
जब कोप करे करतार तब देवे दुष्विचार और दुर्मति ।
  उस समय पुकारें हे भगवान ! हे हरि ! हे प्रभु ! हे नारायण ! जाट हो तो फिर अपना भगवान ढूंढ ले । जो भी हो.. हरियाणी हो, चाहें पंजाबी हो, चाहें गुजराती हो । नमो अरिहन्ता नाम वाला नमो अरिहन्ता नाम बोल दे, बैठे हैं नमो अरिहन्ता वाले भी । जैसे भी हो भगवान के सभी नाम भगवान जानते हैं कि मेरे को पुकार रहे हैं, दुष्विचारों से रक्षा होगी । दुष्विचार, दुष्कर्म, दुष्चिन्तन से जब दुःख आता है तब रोते हैं, “ मैं दुखी हूँ “ रोना उस समय चाहिए जब दुष्विचार हुए । चोर पकड़ा गया मार पड़ती है तो रोता है, जिस समय चोरी करने जा रहा था उसी समय रो कि मैं मुसीबत आने वाले कर्म कर रहा हूँ । जब परेशानी आ रही है, बीमारी आ रही है, तब परेशान हो रहे हैं लेकिन दूसरों को सता के जब मज़ा ले रहे थे.. उस समय रोना चाहिए । दुष्कर्म करते समय आदमी सावधान हो जाए, दुष्विचार, दुष्कर्म करते समय, तो एक काम करना है, दुष्कर्म और दुष्विचार करते समय सावधान हो जायें, भगवान को पुकारें और लम्बा श्वास लें, छोड़ें । कीर्तन करें हरि ॐॐॐ राम राम राम शिव शिव शंभू शंभू हरि हे प्रभुजी ! हे मेरेजी ! हरि ॐ हास्य प्रयोग कर के हसे या रोयें ओहोहो ! मर गया रे ! ठाकुर जी बचा लो । दुष्कर्म, दुष्विचार से बचें । दूसरा सद्विचार को पकड़ रखें, सत्कर्मों को । एक अकाट्य सिद्धांत है – विफल वे ही लोग होते हैं जो दूसरों को दुःख देकर भी अपना मज़े से रहना चाहते हैं । जो दूसरों को प्रेम से भोजन कराता है उसकी भक्ति बन जाती है लेकिन दूसरों को भोजन कराने में जिसको मुसीबत पड़ती है । अब देने वाला तो दाता, है तो गुरूजी का द्वार लेकिन दिल फटे खिलाने वाले का तो उसको फिर नालत भी पड़ती है । और जो प्रेम से खिलाता है चाहें रूखा-सूखा खिलाये, अपनत्व करके उसके लिए लोगों के हृदय में सद्भाव हो जाता है, सद्संकल्प हो जाता है । तो मधुर व्यवहार पुस्तक पढ़ें और किसी को भी खिलाये-पिलाये ले-दे तो वाणी मधुर बोलें । हमारे वासु भाई हैं, ब्रह्मचर्य में तो पक्के हैं लेकिन जिव्हा उनकी ऐसी है कि मछुआरे भी बोलेंगे कि वासु से तो हम अच्छे हैं । वासु वक्ता से तो हम अच्छे हैं । 

वाणी ऐसी बोलिए जो मनवा शीतल होए । औरन को शीतल करे आपहुं शीतल होए ।।
 सासु के लिए, बहु के लिए, पड़ोसी के लिए, किसी के लिए भी ऐसा शब्द न बोलो की उसको चुभे । आज का तुम्हारा चुभने वाला शब्द घूम फिर के तुम्हे चुभायेगा । उसने जो किया वो जाने हम अपना मधुर व्यवहार करें । जैसा आप दोगे वैसा ही पाओगे । ये हरामी है, वो हरामी है, वो हरामी है तू एक नंबर का हरामी है इसलिए तेरे को हरामी दिख रहे हैं । नारायण नहीं दिख रहे, वो दुष्ट है तो अपने अन्दर की दुष्टता ही दुष्ट देख रही है । कैसा भी व्यक्ति बाहर से हो लेकिन भीतर से, गहराई से देखो तो नारायण है । 
वासुदेव सर्वं इति स महात्मा सु दुर्लभः ।
गीज़र हरामी है पानी गर्म करता है, फ्रीज़ बिचारा अच्छा है । अरे ! न गीज़र हरामी है न फ्रीज़ अच्छा है, दोनों का कनेक्शन देखो तो एक लाइट है, एक ही सत्ता है, एक ही ईश्वर की सत्ता है । किसी का राजसी मन, किसी का तामसी मन, किसी का सात्विक मन और सदा एक जैसा मन नहीं रहता । किसी के लिए गाँठ न बाँधो । 

उन्नति के ३ सोपान
एक तो दुष्ट विचारों से, दुष्ट संकल्पों से बचें उस समय लम्बा श्वास लें, भगवान को पुकारें, जप करें, जगह बदलें । 
दूसरा अच्छे विचारों को दृढ़ता से पालें
तीसरी बात है कि भगवान का नाम उच्चारण करके निर्विचार नारायण में शांत होता जाये । 
आप सामर्थ्य भी चाहते हैं और सुख भी चाहते हैं तो सुख और सामर्थ्य दोनों मिलेगा । सुख और सामर्थ्य का मूल तो वो ही है परमेश्वर । जिससे जाग्रत आ के चली जाती है, स्वप्ना आ के चला जाता है, गहरी नींद आ के चली जाती है.. उसको बोलते हैं तुरियातीत । तो माँझ रहा है बर्तन लेकिन भाव गुरु का है, गुरु मेरे ब्रह्मा हैं, गुरु मेरे विष्णु हैं, गुरु मेरे शिव हैं, बोलते तो सब हैं लेकिन गुरु बुलावें तो जायेंगे नहीं । महिमा अपरंपार है तो फिर से बोलता हूँ, भिवानी वालों को और आपको अच्छे-बुरे विचार आते हैं, अच्छे विचारों को सहयोग दो, बुरे विचारों के लिए भगवान ये आ रहा है । हे प्रभुजी ! हे दाता ! हे हरि ! बुरे विचारों का प्रभाव कम हो जायेगा । फिर अच्छे विचार में दृढ़ता लाओ, तो अच्छे विचारों के लिए दृढ़ संकल्प| जीवन में कोई न कोई व्रत या संकल्प होना चाहिए । जो किसी की सेवा करने से कतराता है उसके लिए सफल होना संभव ही नहीं है । बिना सेवा के न भौतिक उन्नति होगी, न आध्यात्मिक, बिना सेवाभाव के भौतिक उन्नति संभव ही नहीं है । वे ही लोग विफल होते है जो अपने सुख के लिए किसी की परवाह नहीं करते । और फिर संकल्प पूछ रहा है, बापू को चिठ्ठि किसने लिखी ? चिठ्ठि किसने लिखी ? बापूजी को क्यों बताया ? मेरे को बता देते, ऐसे लोग कपटी, दुर्बुद्धि होते हैं । 
 

अपनी गलती कोई बताता है तो उसका शुक्रगुज़ार करना चाहिए, अपनी गलती खुद निकालें नहीं निकालते तो कोई तुम्हारे हितैषी को बताता है तो उसके जा के चरण छुओ, उसका स्वागत करो । जो अपनी गलती स्वीकारता नहीं और बताने वाले पर नाराज़ होता है समझो उसके ऊपर बड़ी मुसीबतें आएँगी । घोड़े, गधे की योनियों में डंडे मार के उस के कर्म की गति ठीक होती है । दुष्कर्म करे नहीं, दुष्विचार करे नहीं और उसके पीछे दूसरों से दुश्मनी मोल न ले । मेरी बात किसने कह दी ? कह दी तो सच-मुच में कह दी है तो उसका शुक्रगुज़ार कर, झूठ-मूठ में कह दी तो सहनशक्ति बढ़ा । मेरे लिए कुछ का कुछ बोलते थे, मैंने कभी किसी से वैर नहीं लिया, किसी को मैंने अपने हृदय से बुरा नहीं माना । क्या-क्या करते थे ? मैं तो जूनियर था, बड़े सीनियर थे तो सब भगाने में लगे । चलो उनकी जो मर्ज़ी, मेरे और गुरूजी के बीच में खाई खड़ी कर देते और कभी कभी हम गुरूजी की डांट के पात्र भी बन जाते थे| फिर शांति से समय चला जाता और गुरूजी को पता चलता । अरे ! तूने तो ये किया नहीं.. फिर तेरे लिए बोला तो तू कुछ बोला नहीं? मैंने कहा कोई बात नहीं । तो गुरूजी को तो मेरे लिए और अहोभाव हुआ, जो सज्जनता का व्यवहार करता है न… घूम-फिर के उसकी सज्जनता ही उसकी रक्षा करती है । और जो छल कपट और चालाकी करता है कि साईं को किसने बताया ? वो तो बड़ा बेईमान है । तेरे हितैषी को तेरी गड़बड़ कोई बताता है चाहें मालपाणी बताएं.. चाहें कोई रूपयापानी बताये तो तू उसके चरण धो के पी, हरामी ! क्यों जलता भुनता है ? क्यों ज़रा-ज़रा बात में भड़क जाता है ? बहुत मान मिलता है तो ज़रा सा उन्नीस-बीस हुआ न हुआ, भडकू भैया ! तो वो आदमी उज्जवल भविष्य का सपना नहीं देख सकता है । उज्जवल भविष्य तो उसका जो तोटकाचार्य की नाई, ए तोटक ! क्या कर रहा है ? भागा भागा आया । हाथ में राख और झूठा बर्तन… गुरूजी ने बुलाया है तो अब बर्तन रख के, हाथ धोयें तो देर लगेगी, दौड़ा-दौड़ा आया, इसको बोलते हैं शिष्य । और गुरूजी हैं, बोले- भाई आना और फुर्सत है कोई काम भी नहीं है, झक-मार रहा है अकेला कमरे में, गुरूजी के पास नहीं गया । मनमुखता, शास्त्र विरुद्ध विचार को महत्व न दें और शास्त्र अनुरूप विचार को छोड़ें नहीं, तो हो गया और तीसरा फिर नि:संकल्प हो जायें । कैसा भी तुच्छ से तुच्छ व्यक्ति महान बन जायेगा और नहीं तो वाह-वाही का भक्त हो गया, सुविधा का भक्त हो गया तो अच्छे से अच्छा व्यक्ति भी तुच्छ बन जायेगा । इसलिए भगवान की ये वाणी पक्की याद रखो – आत्मने आत्मनो बंधू| मनुष्य अपने आप का मित्र है जो मन को, इन्द्रियों को संयत करके सत्मार्ग में लगाता है और अपने आप का वो दुश्मन है जो मन-इन्द्रियों के पीछे-पीछे चलता है । 
आत्मने आत्मनो बंधू, आत्मे रिपुरात्मनः । बंधू रात्मनात्मातस्य येनात्मेवमनाजितः अनात्मनस्तु शत्रु से वरतेतात्मे शत्रु  ।। 
  मनुष्य अपने आप का बंधू है अगर वो अंतरात्मा के तरफ सच्चाई से चलता है । अगर छल कपट की युक्ति करके मनमुख होता है तो अपने आप का महा दुश्मन है । फिर कोई पूछता भी नहीं है, वो नाली में पड़े रहते हैं ऑऽऽ ऑऽऽ ऑऽऽ  कभी तो मनुष्य भी बने थे । अब क्या ? अभी क्यों रोते हो ? मनुष्य बन कर जब दुष्कर्म को सपोर्ट दिया, दुष्कर्म छुपाये, दुष्कर्म को पोषित किया उस समय रोना था । अभी क्या रोता है ? अब तू रोयेगा तो सुनवाई भी क्या होगी ? कई कुत्ते रोते रहते हैं ऑऽऽ ऑऽऽ ऑऽऽ दूसरा कुत्ता फिर आ के काटता है । बड़ा प्रसिद्ध आदमी… झींगे तड़पाते हो उस समय रो लो… अब काहे को रोते हो ? और रोते हो तो कौन पूछता है ? जिनको चैम्पियन दी थी वो भी नहीं आ रहे हैं तुम्हारे पास । जय रामजी की ।
गहनों कर्मणा गतिः । 
  अपने आप के मित्र बनो, अपने आप के शत्रु मत बनो । ये शरीर, इन्द्रियाँ और छल-कपट, ये अनात्मा है, दिखता है, हम अनात्मा को महत्व न दें । तो साधन थोड़ा बहुत करते हैं, असाधन ज्यादा करते हैं इसलिए फिर गिर जाते हैं । अंतरात्मा जब नाराज़ होता है न… तो बुद्धि मारी जाती है, निर्णय ऐसे ही होते हैं फिर । कुछ भी हो जाए खटका-वटका तो गुरूजी ऐसा हो रहा है, मेरे को ऐसा हो रहा है, आप ही बचाओ| मैं जैसा तैसा हूँ आपका हूँ, सच्चाई से बोलें तो तर जावें । अरे ! बोल ऐसा किया न किया, बस । बीस-बीस आंसू निकालेंगे| इसको घड़ियाली आंसू बोलते हैं, मगर आंसू, इससे कुछ नहीं चलता । मैंने कहा जा, तो देवशंकर गए, गए तो फिर एक्सीडेंट में गए| आखिर पागल होकर हॉस्पिटल में मर के चले गए, बिचारे । आदमी तो अच्छा था लेकिन अपनी गलती स्वीकारना नहीं, मेरी गलती किसने बताई ? उसको ठीक करना है । सासु गलती बताये, चाहें बहु बताये, चाहें दुश्मन बताये, गलती बताता है तो सच-मुच में है तो उसको धन्यवाद दो और अपनी गलती के प्रति सजाग रहो । ये उन्नति कराएगा और गलती बताने वाले को ही तुम दोषी मानो तो आप गलती को पोषित करते हो तो आप तबाही का रास्ता गहरा कर रहे हैं । तो तीन बातें याद रखो । 
सुमति कुमति सबके उर रहीं । 
 

अच्छे-बुरे विचार सबके पास होते हैं, आते हैं, अच्छे विचारों को महत्व दो और बुरे विचारों के लिए भगवान को पुकारो और लंबे श्वास लो । बुरे विचार का प्रभाव कट जाएगा और अच्छे विचार, अच्छे कर्म करने से चित्त में भगवद्प्राप्ति की तीव्रता आएगी । और भगवद्प्राप्ति की तीव्रता आई तो बस हाजरा-हजूर है भगवान दूर नहीं है, दुर्लभ भी नहीं है, परे भी नहीं है, पराये भी नहीं है । जब भी दुःख आता है तो समझ लेना कि मन की बेवकूफी है| बिना बेवकूफी के दुःख हो ही नहीं सकता, बिना बेवकूफी के अशांती हो ही नहीं सकती, बिना बेवकूफी के कपट कर ही नहीं सकता आदमी । जो तुम्हारे हितैषी है.. वो भी तुम्हारे लिए लगता है कि हमारे पे विश्वास नहीं है, अरे भोंदू ! विश्वास नहीं है ऐसा नहीं है, तुम्हारी भलाई के लिए तुम्हारे हितैषी क्या-क्या दूर का जानते हैं, देखते हैं.. तुमको पता नहीं है । अब माँ है मसल-मसल के नहलाती है, डांटती है, मारती है, ए सिपाही ! पकड़ो इसको, वो माँ तुम्हारा क्या हित चाहती है ! तुमको पता नहीं है । जैसे मूर्ख बच्चा माँ को दुश्मन गिनता है लेकिन वो थोड़ी देर के लिए फिर माँ को चिपकता है ऐसे ही हमारा दुष्ट मन हितैषी का सुना-अनसुना करता है और अहितैषी की बात में आ जाता है । आज का ये नया जनरेशन, माता-पिता, शास्त्र की बात को सुनी-अनसुनी किया और मस्का मारने वालों की बातों में आ के बड़े-बड़े घर के, अच्छे-अच्छे घर के बच्चे-बच्चियाँ बिचारे गिर जाते है । इसमें सज्जनता चाहिए, मैं तो भिवानी समिति को और वहां जो सत्संग कर रहे हैं, करवा रहे हैं, सुन रहे हैं, सुना रहे हैं सबको शाबाश देता हूँ, धन्यवाद देता हूँ । कैसे भी करके भगवद्कथा में जो समय जाता है उतनी देर तो आप झूठ भी नहीं बोल रहे हो, उतनी देर आप गुस्सा भी नहीं कर रहे हो, उतनी देर कामी, क्रोधी, लोभी नहीं, मोही नहीं, उतनी देर भगवान के लिए बैठे हैं । इतना समय तो सफल हुआ और कोई बात भी पकड़ ली भिवानी वालों ने अथवा चंदीगढ़ वालों ने अथवा अहमदावाद वालों ने, तो अच्छी बात पकड़ ली तो फिर कितना भविष्य उज्जवल हो जायेगा ! ऐसे लोगों को सभी को धन्यवाद देता हूँ, शिवजी की तरफ से –
धन्या माता पिता धन्यो गोत्रं धन्यं कुलोद्भवः ।
धन्या च वसुधा देवि यत्रस्याद् गुरुभक्तता ।।
  हे पार्वती !  उनकी माता धन्य हैं, उनके पिता धन्य हैं, उनका कुल और गोत्र धन्य है जिनके हृदय में गुरुभक्ति हैं । हरि ॐ ऽऽ हरि ॐ ऽऽ हरि ॐ ऽऽ हरि ॐ ऽऽ ॐॐॐ….हरि ॐॐॐ प्रभु ॐॐॐ भिवानी वाले ॐॐॐ दिल्ली वाले ॐॐॐ…हरि ॐॐॐॐ…प्रभुजी ॐॐ प्यारेजी ॐॐ आनंद ॐॐॐ माधुर्य ॐॐ ( देव-मानव हास्य प्रयोग ) ॐॐ 
द्वेष तबाही करता है, राग-द्वेष तबाही का कारण है । प्रभु को स्नेह करो ( कीर्तन ) सबका मंगल, सबका भला ॐॐ सबके रूप में वो ही सबका स्वामी आत्मदेव, राग-द्वेष बुद्धि खराब कर देता है, छल-कपट अन्धकार में भविष्य ले जाता है । सरल स्वभाव नमन कर लाई, यदा लाभ संतोष सदाही । बेड़ा पार कर देता है । ॐॐॐ…प्रभु तेरी जय हो, आनंददेवा तेरी जय हो, मीरा भई प्रेम दीवानी, घुंघरू बाँध मीरा मेवाड़ में नाची, गौरांग बंगाल में झूमे, छोडो राग-द्वेष, ईश्वर में मस्त रहो, कीर्तन में मस्त रहो, सत्कर्म में मस्त रहो आनंद है ।

वैर को प्रीत में बदलने की कला
  जिससे भी दुश्मनी है मन ही मन उसको प्रदक्षिणा करो । कट्टर दुश्मन हो उसकी गहराई में मेरा परम हितैषी बैठा है । बाहर से दुश्मन दिखता है उसका मन, बुद्धि लेकिन अन्दर मेरा हितैषी है । मन ही मन प्रदक्षिणा करो । हे हितैषी परमात्मा ! समझो मोहन मेरा पक्का दुश्मन है, मेरे को जान से मार डालने की सोचता है । मुझे क्या करना चाहिए ? मैं भी उसको जान से मारू तो मेरे में और कुत्ते में फर्क नहीं है । मैं क्या करूँ ? मोहन को सुबह-सुबह प्रदक्षिणा करो । मोहन बाहर से तो तुम मेरे पे नाराज़ हो लेकिन भीतर से तो तुम वास्तव में मोहन हो, मोहनरूप हो, परमात्मरूप हो । ये हमारा द्वेष आपको हरामी देख रहा है, हमारा मन हरामी है इसलिए आपको हरामी देख रहा है । आप तो चैतन्य हैं, आत्मदेव है, ब्रह्मस्वरुप हैं, मोहन तो आपके लिए ब्रह्मस्वरुप हो जायेगा, आप भी ब्रह्मस्वरुप बन जायेंगे । अपना बेटा है, कहना नहीं मानता, पति है, पत्नी है, छोरा है, कोई कहना नहीं मानता, छोड़ दो ईश्वर के हवाले, मेरा बेटा नहीं है, ईश्वर तेरा बेटा है । अपनी ममता हटा दोगे तो उसका भला हो जाएगा । आप उसका भला सोच के कुछ कह दो तो ठीक है लेकिन दुखी होकर, उसका बिगाड़ कर उसको आप सुधार नहीं सकते । ऐसे ऐसे गुरु देखे कि बारह साल तक चेले से बात नहीं करते और चेले ने क्या-क्या मेहनत करी गुरु को रिझाने के लिए और बारह साल के बाद गुरु रीझे । तो बाहर से गुरु का कठोर व्यवहार भी अन्दर से उसके भले के लिए होता है । बुल्लाशाह के गुरु ने बारह साल तक बुल्ले से बात नहीं किया, आने नहीं दिया, जब भी आये तो धक्के मार के निकाल देते थे, फिर भी बुल्ला डटा रहा । तो संत बुल्लाशाह बन गए, बढ़िया हो गए । 
दुर्जन की करुणा बुरी भलो साईं को त्रास । 
 

इधर तो त्रास करता भी नहीं कभी, नहीं तो गुरुद्वार पे कैसा-कैसा होता है, शिष्य गुरु को मनाते हैं यहाँ तो उल्टी गंगा बह रही है । गुरु ही शिष्यों को दिन-रात मना रहे हैं, ये लो प्रसाद लो, ये खाओ, ये करो वो करो । यहाँ तो उल्टी गंगा बह रही है हमारे यहाँ पर, भगवान से पंगा लेने का फायदा, तू मिल जा तो मैं तुझे सस्ता कर दूँगा, भगवान को तो सौदा अच्छा लगा लेकिन मैं सस्ता करते करते मैं ही सस्ता हो गया । किसी को चाहिए नहीं बापू को ही सस्ता बना दिया । जब चाहें चलो । कई महीने गुरु के आश्रम में पड़े रहते थे तब कहीं गुरूजी पूछते थे । कहाँ से आये ? फिर आज्ञा दें तब पूछने का होता था| तुम तो आये और बस ये हो गया, ये हो गया, ये कर दो, वो कर दो, तुम चाहें एकांत के लिए आये लेकिन हम आयें तो तुम्हें नोचें बस । हमारा ये प्रॉब्लम है, ये समस्या है, ये है, इनता गुरु ने अपने को सस्ता बना दिया कि गला भी बैठ जाए.. फिर भी मौज है । अपना उद्देश्य ऊँचा बना लो बस, ऊँचा उद्देश्य आपको ऊँचे सुख में स्थित कर देगा, बीच का उद्देश्य बीच में भटकाएगा और उद्देश्यहीन व्यक्ति तो जब जैसा आया चल पड़ेगा । वो तो फिर कीट पतंग की योनी जैसा हुआ, जहाँ बत्ती जली पतंगिया आ गए, जल के मरते हैं, दुखी हो के परेशान होते हैं । जैसा मन में आया.. चल मेरे भैया!!! न कोई भविष्य का विचार, न वर्तमान का कर्तव्य, न गुरु के साथ की वफादारी, बस जो आया बस, अपने मन का विचार सर्वोपरि है । मैंने ये सोचा, मैं ये समझा, मैं ये समझा, काला मुँह हुआ तेरा फिर तो, मैंने ऐसा समझा तो बुद्धि मारी गयी है । अपनी अक्ल न हो तो फिर कहीं शास्त्र की और अक्ल वाले गुरु की बात पर ध्यान देना चाहिए । अपनी अक्ल नहीं है और हितैषी की बात मानना नहीं है, हितैषी बुलाये तो भी नहीं जाना है, वाह भई वाह ! धन्य हो ! 
तो एक पक्की बात कि बुरे विचारों को, मनमुखता को उखाड़ के फेंको, अच्छे विचारों को अविचल विश्वास से पालो और फिर विचार जहाँ से उत्पन्न हो कर शांत हो जाते हैं उस परमात्मा में पहुँच जाओ बस । तीन स्टेप हैं खाली । नारायण हरि हरि ॐ हरि ।
 

जीवन तो सुखमय है, रसमय है लेकिन अपनी गड़बड़ों से जीवन ज़हरी बन जाता है, नहीं तो आनंद ही आनंद है । डायोजनिस ऐसे आनंद में लेटे थे, पता चला कि सिकंदर आ रहा है । वो जान-बुझ के ऐसी सकरी गली में पैर पसार के लेट गए । मंत्री ने कहा- महान सिकंदर आ रहे हैं, पैर फैला कर रास्ता बंद करके सोये हो । बोले- कौन है महान ? इधर भेजो उसको| मंत्री को लगा कि गज़ब का आदमी है । सिकंदर को कहा कि डायोजनिस नाम के एक होलीमैन हैं, संत आदमी हैं । तो आया था तमतमाता हुआ कि मेरा रास्ता रोकने वाला कौन है ? महान सिकंदर का, लेकिन नज़दीक आया और डायोजनिस के सामने देखा तो बड़ा प्रसन्न, बड़ा सहज, उसकी सहजता और प्रसन्नता, जैसे बच्चा सहज होता है, प्यारा लगता है न…ऐसे डायोजनिस को देख के बड़ा अच्छा लगा । 
सिकंदर बोला, “ आपके पास तो कोई सत्ता नहीं है, कोई सेना नहीं है, हीरे जवाहरात मोती नहीं हैं फिर भी ऐसे सिकंदर से भी ज्यादा प्रसन्न तुम कैसे हो ? आप कौन हो ? “
डायोजनिस बोले, “ तू कौन है ?”
“ मैं महान सिकंदर विश्व विजयी होने के लिए निकला हूँ|”
डायोजनिस ने टोंट मारते हुए पूछा, “ विश्व विजय ! बाहर विजय होता है कि भीतर होता है ! अपने बुरे विचारों पर विजय होती है, बुरे संकल्पों और कर्मों पर विजय होती है, वो विश्व विजय होता है, बाहर कोई विश्व विजय आज तक किसी ने किया है क्या ?? ये कैसी पागलपन की बात कर रहे हो ! जब भी आदमी विजयी होता है तो भीतर होता है, बाहर तो उसका परिणाम होता है खाली । पराजित भी भीतर से होता है आदमी, विजयी भी भीतर से होता है, बाहर से विश्व विजय किसकी हुई आज तक!” सिकंदर सोचने को मजबूर हो गया, बोले- बात तो ठीक कहते हो । 
“ तुम इतने खुश कैसे ?”
“ बोले- बस भीतर से विश्व विजयी हो जाओ । इच्छा पूर्ती में तो पराधीनता है, परिश्रम है और इच्छा पूर्ती करते करते ज़िन्दगी पूरी हो जाती है, इच्छाएँ बनती रहती हैं लेकिन इच्छा की निवृत्ति में विश्व विजय है । डिजायर लेस हो जाओ और इच्छा रहित पुरुष को जो शांति और सुख मिलता है वो चक्रवर्ती सम्राट भी उसके आगे भीखमंगा है|”
बोले, “ बात तो तुम्हारी ठीक है, मुझे भी ऐसी शांति चाहिए, ऐसा विजय चाहिए|”
डायोजनिस बोले, “ है, जगह है बैठ जाओ । पैर पसार के लेट जाओ, छोडो सबको जाओ । न उनसे तुम बंधो न उनको तुम बाँधो|”
बोले, “ नहीं, अभी एक बार विश्व विजय करके फिर आऊंगा|”
बोले, “ फिर कैसे आओगे ? विश्व विजय होना ही नहीं है और फिर वापस आना ही नहीं है । जो अभी करना है कर लो|” 
बोले, “ बात तो तुम्हारी ठीक है लेकिन अभी जरा विश्व विजय करके आऊँ|”
बोले, “ सिकंदर नहीं लौटोगे वापस|” वो नहीं लौटा रास्ते में ही मर गया । इस पर विजय, इस पर विजय, वो हरामी है.. उसको ठीक करो । अरे ! अपने को ठीक कर न..बबलू । ज़रा-ज़रा बात में कैसे भड़क जाते हैं, ज़रा-ज़रा बात में कैसे पलायन हो जाते हैं, ज़रा-ज़रा बात में कैसे खोपड़ी उल्टी हो जाती है !! उसपे विजय पाओ । नहीं पाते तो पुकारो अथवा कोई हितैषी है उसके आगे दिल खोल के बात करो, वो नहीं करना है, तो जाओ फिर देखो क्या होता है ? जिस रास्ते जा रहे हो तो देखो क्या होता है फिर ? जो अपने हितैषी का फायदा नहीं ले सकता फिर दूसरे किसका फायदा लेगा ! जो मात-पिता की कृपा का, गुरु की कृपा का फायदा नहीं ले सकता है फिर तो वो ही हैं लोफर काम, क्रोध, लोभ, मोह, कपट, बेईमानी, ये वो, लाहपर्वाही, ये सब तुम्हे उलझा देंगे । फिर वापिस वापिस जन्मोगे, वापिस वापिस मरोगे, वापिस वापिस रोओगे, वापिस वापिस भागोगे, वापिस वापिस जागोगे, वापिस ही वापिस । बुद्ध भगवान कहा करते थे- तुमने वापिस कितने जन्म लिए.. सभी जन्मों की हड्डियाँ इकट्टी करें तो बड़े पहाड़ को भी नन्हा बना दे, सभी जन्मों के रुदन के आसू इकट्टे करें तो बड़ा सरोवर भी छोटा हो जाएगा । इसलिए बुरे संकल्पों से बचें, इच्छापूर्ति के सुख की दासता से बचें । इच्छा निवृत्ति में लगो । सुख लो मत सुख बांटो, मान लो मत मान बांटो । वो ही व्यक्ति विफल होते हैं और वे ही व्यक्ति अभागे होते हैं जो दूसरे के दुःख का विचार किये बिना, दूसरे को दुखी करके भी सुखी होने में लगते हैं । चाहें झींगे को दुखी करो, चाहें मछलियों को दुखी करो, चाहें गरीबों को दुखी करो, दुःख देकर कोई सुख लेता है बड़े दुःख के लिए प्रकृति उसको घसीटती है और दुःख सहकर भी दूसरे के दुःख मिटाता है वो तो दुःखहारी हरि के साथ एकाकार हो जाता है, इतना ही गणित है । सुख सुविधा का भोगी मत बनो, उपयोग करो लेकिन दूसरे के सुख-सुविधा बढाने में तत्पर रहो, सेवा खोज लो, कमरा बंद करके घुस के बैठने में कुछ नहीं मिलेगा । एक था भोपाली भेजा था हमने हिम्मतनगर के आश्रम में, देखा कि बापू अन्दर रहते हैं वो अन्दर कमरे में योग वशिष्ठ पढ़ा… फिर बोलता है मेरे को साक्षात्कार हो गया । मैंने कहा ये छोड़ बेफकूफी की बातें हैं, माना ही नहीं| मेरे को तो साक्षात्कार हो गया, चाहें खाने को मिले न मिले जैसे भी, बड़ी-बड़ी बातें करने लगा, बाद में पता चला कि अपने मन से साक्षात्कार मान लिया था, मेरी बेवकूफी थी । अब सुधरा है थोड़ा, मन के चुंगुल में नहीं आना चाहिए । 

ठगों से सावधान !
  एक ऐसा ग्रुप चल पड़ा कि बापूजी ने कहा है कि बेटे १०८ व्यक्तियों को साक्षात्कार कराना है, लेकिन अब १०८ से भी ज्यादा २१६, ३२४ लोगों को खास-खास और मेरी जो भी आश्रम और संस्थाएं हैं वो उन्ही व्यक्तियों को दूँगा । किसी के गर्भ से कलंकी अवतार पैदा होने वाला है, बापू ने ऐसा कहा है, बापूजी ये फलाने साहब हैं आप इनको भी ज़रा परिचय देना । ऐसा मोबाइल पकड़ के हाथ में यूँ घुमाया और उसका जो कलंकी अवतार पैदा करने वाली लवरी है वो परदे के पीछे बैठी है । ‘वो नाम शांतिलाल मोहनलाल पटेल, ये मेरे खास शिष्य हैं और ये जो कह रहे हैं कि कलंकी अवतार होने वाला है, ये सच-मुच होगा’, मैं आशाराम बापू हूँ । यूँ किया और दिखा दिया मोबाइल, देखो बापू ने एस.एम.एस किया है । मैं कभी एस.एम.एस किसी को करना चाहूँ तो नहीं कर सकता हूँ, मैं जानता ही नहीं । ऐसे करके लोगों को गुमराह कर देते हैं फिर उनसे मथ्था टिकवाते हैं, अभी कलंकी अवतार तो आया नहीं है, लेकिन उसके लिए गोद भरने के लिए दक्षिणा मांग रहे हैं । ऐसा-ऐसा स्टंट कर रहे हैं कि कई अच्छे अच्छे लोग ठगे जायें । मेरे तक बात आई तो मैंने ज़रा ज़ाहिर में कह दिया, तो उनका थोड़ा भांडा फूट गया लेकिन फिर भी नए सिरे से चालू किया कि देखो बापूजी ने कहा है कि ये तुम्हारी परीक्षा थी, मेरे बच्चे तुम परीक्षा में पास हो गए । अब नया शुरू कर दिया, जो कच्चे-कच्चे थे वो बिखर गए पक्के-पक्के रह गए । मध्य प्रदेश विदीशा में वो चल रहा है धटिंग, पहले छिन्दवाड़ा में चला था फिर भोपाल में चला फिर दिल्ली तक हुआ । है तो उसकी गर्लफ्रेंड और बोलता है बापूजी की आज्ञा है इसे कलंकी अवतार होने वाला है । अब गर्लफ्रेंड के द्वारा मैं कलंकी अवतार तुम्हारे को कराऊंगा ये तो मैं करना चाहूँ तो नहीं कर सकता, काहे को धोखा करते हो लोगों के साथ ! लेकिन जहाँ लोभी हैं वहां ठग भी हैं, चलो १०-२० हज़ार दिया.. अब अपने को साक्षात्कार भी हो जायेगा, बापू के आश्रम के हम ख़ास बन जायेंगे, वेटिंग लिस्ट में नाम लिखवा रहे हैं । जैसे चंद्रमा पर ज़मीन मिल गयी है और लोग यहाँ अमेरिका में बैठे-बैठे चंद्रलोक की ज़मीन का दस्तावेज़ कर रहे हैं, अब तुम्हारा बाप पहुंचेगा वहां, अभी ज़मीन बिक रही है । ऐसे ही कलंकी अवतार होने वाला है उसके कुछ ग्रुप बन गए हैं, एक मेन ठग है और दूसरी उसकी गर्लफ्रेंड है, ऐसी साजिश करते हैं और बाकि के उसके चमचे हैं, चल पड़ा है । लेकिन मज़े की बात है कि मैं बोल देता हूँ ज़ाहिर में न… तो सारा धडाक-धूम । ऐसे ही कोई देशी घी बापू की गौशाला का है… मेरी गौशाला का इतना घी होता ही नहीं कि बाज़ार में बिके, बिकता होगा तो दस-पाँच-पच्चीस किलो.. बाकि किसी की गौशाला का लाते हैं, समिति वाले देते हैं फिर देखते हैं कि उसमें क्या पता क्या है, तो फिर मैं बंद करवा देता हूँ । सही होता है तो भई ले जाओ भले, गाय के घी की महिमा तो मैं भी करता हूँ । लेकिन गाय के घी के नाम पर बटर-ऑइल चल पड़ता है और भी क्या-क्या ८०% फलाना । मेरे को पसंद नहीं है मेरे नाम से ठगी या किसी के नाम से कोई ठगे तो मैं तुरंत बम-धड़ाका मार देता हूँ । अब विदीशा में चल पड़ा है.. पहले छिन्दवाड़ा में चला था, भोपाल में चला था.. फिर दिल्ली में वो आई थी धतिंग, ऑपरेशन करके ठीक कर दिया । वो टीम थोड़ी देर अंडरग्राउंड हो गई| फिर वो जगी कि बापूजी आपने जो परीक्षा ली है यहाँ फलाने भाई हैं उनको आप अपना आशीर्वाद दो । ‘ हाँ, मैं आशाराम बापू हूँ, परीक्षा ली और मेरे बच्चे पास हुए, कलंकी अवतार होगा’ । ए हरामी ! मैं काहे को बोलूँ, कलंकी अवतार ! कौन-सा तेरा बाप कलंक किया है और सारे आश्रमों को कलंकी अवतार संभालेगा और अभी जो कलंकी अवतार के मेम्बर बनेंगे वो उनके साक्षात्कार के पात्र होंगे । क्या-क्या और भी कुछ बकते रहते हैं लेकिन ये सब बंडलबाज़ी है दूसरों को ठगने की है| बापू के नाम लोग बिचारे तन-मन-धन अर्पण करने को न्योछावर हो जाते हैं क्योकि कुछ फायदे भी होते हैं । अब वहां गए हम सोलन.. तो सोलन समिति का एक मेम्बर बीमार पड़ गया था कोमा में चला गया था, शिमला में एडमिट था । बापूजी! बापूजी! कहीं जांच करवाई सवा लाख रुपया खर्चा हो गया कुछ पता ही नहीं चल रहा है । एकाएक हट जाओ ! हट जाओ ! हट जाओ ! वो पेशेंट चिल्लाने लगा बापूजी आ रहे हैं, सब हट गए| उसको आपका दर्शन हुआ, बापूजी वो आपके सामने अभी लाये हैं, उस आदमी ने बोला कि ऐसा हुआ । अब ऐसे-ऐसे फायदे होते हैं भगवान की लीला से तो फिर बापूजी के लिए तो लोग बिचारे कुर्बान हो जायेंगे । फिर ऐसे ठग भी बापूजी का एस.एम.एस. आया, बापूजी ने मेरे को ख़ास कहा है, ये बापूजी का ख़ास है, ऐसी ठग विद्या भी चल पड़ी है, ऐसे ठगों से सावधान रहना । ये बापूजी का ख़ास है, बापूजी का एस.एम.एस. आया, मैं एस.एम.एस. करना जानता ही नहीं । कभी किया ही नहीं, एक बार भी मोबाइल फ़ोन पर मैंने एस.एम.एस तो क्या, एस.एम.एस का एस.एम. भी नहीं लिखा है । मैं सच्चाई से बोलता हूँ तो बीच में तो मैंने भड़ाका किया थोड़ा बंद हो गया, फिर नए सिरे से बापूजी का एस.एम.एस चालू हो गया है । मध्यप्रदेश, उसमें कई ऐसे बेवकूफ लोग जुड़ गए हैं, अपना जो ऋषि था न.. निर्माण विभाग का संचालक वो भी उसमें भाग गया जुड़ गया, दूसरे भी कई । वो डॉक्टर है न.. अश्विनी डॉक्टर हिमाचल के उनको भी फसा लिया था, अभी हैं कि नहीं, वो पहले के धड़ाके से निकल आये बाहर । आप बच गए नहीं तो आप जैसों को भी.. ऐसी-ऐसी बातें करता, कलजुग है तौबा-तौबा !! फिर भी मौज में रहो भगवान सत्य के पक्षधर हैं । सत्य को आँच नहीं, झूठ को पैर नहीं । अभी बोलूँगा वो टुकड़ी वाले फिर आठ दिन अंडरग्राउंड हो जायेंगे, अभी जो बोल रहा हूँ न… आठ दिन फिर चुप हो जायेंगे अंडरग्राउंड हो जायेंगे । फिर नया तुक्का चालू करेंगे ।
 

ऐसे ही एक महाराज बड़े, मेरे को तो उसके प्रति प्रसन्नता हुई कि इस उम्र में ऐसा त्यागी तपस्वी, बड़े प्रसन्न । मैंने कहा- आपको, हाँ तो बोले वो ही है सब एक का एक है| बात ऐसी करे साक्षात्कार  हो गया है । तो मैंने कहा- आपको साक्षात्कार गुरूजी ने कराया, कहाँ पर हुआ ?  बोले मणिमहेश्वर में । कहाँ है मणिमहेश्वर ? बोले पठानकोट की तरफ रास्ता जाता है.. उसने एड्रेस बताई, मैंने जांच करवाई । मणिमहेश्वर १२००० फूट की ऊंचाई पर है तो वहां शिवजी मणि दिखाते हैं, लोगों का मनोरथ पूरा हो जाता है, बहुत लोग जाते हैं । अभी तो फलानी जगह से हेलीकाप्टर वाला ले जाता है ६ मिनट में उधर पहुँचा देता है । पहाड़ी पे इतना हज़ार फीट ऊपर जाओ.. फिर ऊँची पहाड़ी पर ६००० दे दो हेलीकाप्टर वाले को, ले जाएगा । तो मैंने जांच करवाई.. वो हेलीकाप्टर वाला तो लुधियाना का था, बापूजी आ रहे हैं, उसने बोला- बापूजी आप ही का हेलीकाप्टर है । मैंने कहा ठीक है, शाबाश है, तो हम तो ६००० की डिस्टेंस पे क्यों जाएँ ! हम तो पठानकोट से ही गए । २०००० लग जायें, वो तो फ्री में ही दे रहा है तो हम तो पहुँचे वहां रात रहे, तो १२००० फूट ऊंचाई पर है वहां कोहरा-कोहरा रहता है तो कभी कबार कोहरा आगे-पीछे जाता है तो एक चमचमाता मणि दिखाई देता है । बं बं बं बं बं बं भोले जय शंकर, सब जो तम्बू तान के बैठे होते हैं या जो यात्री होते हैं जैसे बद्रीनाथ, केदारनाथ में वो बोलते हैं । ऐसे ही वहां यात्रियों के लिए छोटे-मोटे बनाये हैं सराए-वराए ये वो, बद्री-केदार जितनी भीड़ तो नहीं होती लेकिन शुरू हो गयी भीड़.. बं बं बं । फिर कहीं गौरी कुंड बना दिया कहीं.. शिवजी यहाँ आये थे वो बना दिया वहां के पंडों ने अपना तीर्थ का निर्माण कर लिया । अब बारह हज़ार फूट पर तो वहां ऑक्सीजन की कमी है, कई लोग बीमार हो जाते हैं, न्यूमोनिया हो जाता है, कई बिचारे जाते हैं जिन्दे और लाश उतरती है । हेलीकाप्टर में ऐसे ही अधमुए ले आते हैं, वो हेलीकाप्टर वाले ने ज़ाहिर कर दिया कि आशाराम बापू खुद भगवान मणिमहेश्वर के विषय में लोगों को ज्ञान देंगे, समझायेंगे । उसकी तो हेलीकाप्टर की ग्राहकी बढ़ गयी, मेरे को तो फ्री कर दिया लेकिन दूसरे ग्राहक जो कुछ फसे होंगे । मैंने देखा और लौटा बापूजी कैसा लगा ? मैंने कहा साक्षात् शिवजी भी आ जाएँ तो भी आत्मज्ञान के सत्संग के बिना साक्षात्कार नहीं होता । शिवजी के यहाँ रहने वाले लोग भी कई बार गड़बड़ करते हुए सुने गए हैं| पार्वती को उठा कर पुलाव बना दिया शिवजी के भक्त-भक्तानियों ने । अब शिवजी यहाँ मणि दिखाते हैं और साक्षात्कार हो जाये अथवा ये हो जाये, मणि-वणी कुछ नहीं है पूँछ वाला तारा है, कलजुग में दिखता है, पूँछ वाला तारा दूसरे तारों से थोड़ा नीचा होता है । तो कोहरे में कभी-कभी कोहरा हट गया तो पूँछ वाला तारा दिखता है और ये बोलते हैं भगवान शिवजी मणि दिखा रहे हैं । शिवजी खुद आ के खड़े हो जाएं तो भी बोलेंगे प्रचेताओं जाओ.. नारदजी का सत्संग सुनो । तो मैंने तो हवा निकाल दी, तो हमारे समिति वाले जो पैसे इकट्टे करके वहां भंडारा करते थे, महिना-महिना पन्द्रह दिन जाते रहते थे, वो सब बच गए लेकिन दूसरे लोग तो अभी भी रगड़े जा रहे हैं । ऐसे ही कई तीर्थ आमदनी का साधन करने के लिए बड़ा पीर है, ये पुराने हनुमानजी हैं । 
 

मुरारी बापू को किसी पुजारी ने कहा कि महाराज आप तो भगवान हनुमानजी को पूजते हैं, हनुमानजी आपके इष्ट हैं, दर्शन करने नहीं आये । बोले- हमारे निवास के पास में हनुमानजी भगवान के दर्शन कर के ही मैं गया कथा में । अरे ! बोले वो तो बूढ़े हनुमान जी हैं, वो क्या करेंगे ? हमारे यहाँ नया मंदिर है जवान हनुमानजी.. हाँ तो वो तुम्हारी इच्छा पूरी करेंगे, बूढ़ा आदमी क्या करेगा ? मुरारी बापू जैसों को भी पुजारी लोग… कई लोग बोलते हैं ये प्राचीन हनुमान हैं, ये इनका तो नया है मेरा पुराना मंदिर है, प्राचीन हैं हनुमानजी सच्चे हैं, वो तो अब के हैं, और अब वाले बोलते हैं अरे ! वो तो बूढ़े हनुमान हैं हमारे जवान हैं । धर्म के नाम पर ठग लो मुकुट, ठगी करने में भी कोई देर नहीं लगती । तो मेरे नाम पर क्या का क्या चलता रहेगा, सब लोग सावधान रहना ! बापूजी ये चाहते हैं, ये मेम्बर बन जाओ, ये कर लो, वो कर लो । कई लोग बीमा कंपनी वाले भी समिति में घुस जाते हैं फिर परिचय करके बीमा के एजेंट अपनी रोकड़ी करते हैं । माला पहना दी गुरूजी के आगे, बस हो गया नाम फिर विश्वास करके बीमा कंपनी वाले बीमा का काम करते हैं और लोग अपना और सेल्समैन का काम करते हैं । ऐसे ही मंदिरों में कई कुछ, तीर्थों में कई कुछ, बड़ा कलजुग विचित्र है ! फिर भी इमानदारी से भगवान को चाहोगे तो अंतरात्मा में आवाज़ आएगा कि ये तो हम को ठग रहे हैं, चल भैया, उसकी बातों में नहीं आओगे । बाकि तो जगत को ठीक-ठाक करके फिर भजन करोगे तो भजन नहीं कर सकोगे, जगत में ही उलझ जाओगे । इसलिए आप तो भजन का रस लेते जाओ और ऐसी वैसी बातों से तुम भी बचते जाओ और कभी मौका मिले तो मैं तो खुले आम बोल देता हूँ । संत आशाराम आश्रम आगरा में नकली घी बिकता है । अरे ! बोले- बापू! आपके आश्रम में, आश्रम मेरा है तो क्या है ? नकली है तो नकली है । फिर वहां के लोग घबराए बोले- बापूजी! हम तो गाय का घी देते हैं । बोले- गाय का घी देते हो तो लोग समझते होंगे बापू की गौशाला का है, तुम कहाँ से लाते हो ? गौशाला में इतना घी होता ही नहीं है । बोले- हम पूना की डेयरी से लेते हैं, मैंने कहा पूना में इतनी गायें जी ही नहीं सकतीं, देशी गाय इतनी हो नहीं सकती, वहां तो उतना चारा नहीं है और वहां का क्लाइमेट गायों के अनुकूल नहीं है । पूना में कोई डेयरी है वो पूरे देश को सप्लाई करता था गाय का घी । फिर ब्रिटेनिया वाले भी उनका बेचते थे गाय का घी । मैंने पैकेट भी देखा, ब्रिटेनिया बिस्कुट वाले भी बेचते थे, पाउच आधा किलो का । लेकिन वो आर्टिफीशियल घी है, बटर आयल है, लेबोरेटरी से पास कराके आ जाते हैं तो क्या हो गया ! मैं तो चिल्लाया तो आगरा समिति ने, आगरा का संचालक जो थोड़ा लोभी है.. उसने बंद कर दिया । दूसरा फिर श्योपुर गौशाला वाला गजानन संचालक ने किसी से घी लिया और दिल्ली भेजा मणि काका को, देशी-घी अब गौशाला वाले ने भेजा है तो लोग ले जायेंगे । ३५० रुपये था उस समय लेकिन वो सोयाबीन में से बना था ९० रुपये वाला और ९० रुपये वाला घी खरीद के हमारा संचालक ३५० में बेच रहा था । ३५००० कमा लिया, बाइक लाया और एक्सीडेंट में चोट लगी| मैंने कहा अच्छा हुआ, उसका पोल भी मैंने खोल दिया और वो बाइक पे एक्सीडेंट में लगा । उस समय तो माफ़ी मांगी लेकिन अभी फिर दूसरा कुछ करेगा तो जिनको गलत विचार और गलत कर्म का चस्का लगा है वो तो एक बार चोट खा के सुधर जायें ये कोई ज़रूरी नहीं है फिर फिर से आदत पुरानी । 
स्वस्या प्रकृति प्रेरिता: । 
  भगवान कृष्ण अर्जुन को बोलते हैं, तू बोलता है युद्ध नहीं करूँगा । अरे ! तू अवश्य युद्ध करेगा क्योकि तेरी प्रकृति है, क्षत्रिय है तू । आततायी ऐसा करें और तू युद्ध नहीं करे.. ये तो क्षणिक तेरा वैराग्य है । तो श्रीकृष्ण की बात सच्ची निकली ऐसे ही मैं द्रष्टान्त देता हूँ कि एक फौजी था उसने अपना रिटायरमेंट लेकर वौल्युन्टरशिप की और रहने लगा अपने इलाके में । अब रिटायर हो गए तो घर की दही लेने गए कटोरे में । किसी ने कहा अटेंशन !! फौजी ने कटोरा यूँ फेंक दिया और दोनों हाथ यूँ करके अटेंशन हो गए, अपना स्वभाव । ऐसे ही जिनका अपना-अपना स्वभाव होता है उसके अनुरूप जब भी मौका मिला तो लग जाते हैं । दृष्टि रखनी पड़ती है, अपने नाम से, धर्म के नाम से, भगवान के नाम से ठगों मत और कोई ठगा जाए तो आप आंख मिचोली मत करो| अपना कर्तव्य है, भक्तों की श्रद्धा का दुरूपयोग न हो । लोगों के विश्वास का घात न हो । तो मैं तो चिल्लाया श्योपुर गौशाला वाला संचालक नकली घी भेजा । मणिकाका के पास से लोग ले जाते थे । ८०-९० रुपये उस समय बिकता था । १००-१२५ में लेता होगा । ३५० में बेचे और बापू के नाम से बिके, ऐसे ही गाँधीहाट में भी गाँधी के नाम से कितनी लूट होती है । गाँधीहाट ग्राम उद्योग, खादी उद्योग, गाँधीजी बिचारे तो इमानदार आदमी थे लेकिन उनके नाम से…. कृष्ण तो सबका भला चाहते हैं लेकिन कृष्ण के नाम से, अल्ला तो सबका भला चाहते हैं लेकिन अल्ला के नाम से क्या-क्या होता है ! आदमी का जैसा स्वभाव होता है वो ऐसे ही करता है इसलिए मार्ग कठिन है वरना ईश्वर, अल्ला, भगवान, गॉड कोई कठिन नहीं हैं । हमारे हल्के विचार, हल्की वासनाएं, एक दूसरे का शोषण करके सुखी होने की बेवकूफी अपने को और दूसरों को भगवान से दूर कर देती है । नहीं तो भगवान तो हाजरा-हजूर है.. अपना आत्मा है, जाग्रत में वो अपने साथ है, स्वप्ने में अपने साथ है, गहरी नींद में अपने साथ है, समाधी में अपने साथ है । समाधी आती-जाती है, जाग्रत आता-जाता है, स्वप्ना आता-जाता है, दुःख आता-जाता है लेकिन वो दाता ज्यों का त्यों रहता है । वो ही तो आत्मदेव है वो ही तो परमेश्वर है । कहीं आकाश में बैठ के थोड़ी दुनिया हो जाता हैं, यहाँ बना रहा है, धरती पे इतने मनुष्य नहीं हैं जितने आपने शरीर में बैक्टेरिया बना रखे हैं । आप बैक्टेरियों के ब्रह्मा हो, उनका पालन करते हो तो आप ही विष्णु हो और वो मरते हैं तो आप ही महेश्वर हो और वो मरेंगे फिर भी आप ज्यों के त्यों रहते हो तो आप साक्षात् परब्रह्म हो । कहीं दूर परब्रह्म नहीं है आप ही हो, पराया परब्रह्म नहीं है आप ही हो, खाली ये हलके विचार, ठगी के विचार, मनमुखता उल्झा देती है आदमी को । जो अन्दर वो बाहर, मगर आंसुओं से काम नहीं चलता, रोने धोने से मुँह बनाने से काम नहीं चलता, सच्चाई, सहजता । 
बाहर भीतर एको जानो ये गुरु ज्ञान बतायो । 
 

सहज में हो जाओ क्या है ! नेताजी थे बोले- देखो बेटे! वो आ रहे हैं, मैं बेसमेंट में जाता हूँ लोगों को बोलना कि मिनिस्टर साहब घर पर नहीं हैं, नहीं तो वे सिर खपायेंगे । लाइट नहीं आती, पानी नहीं आ रहा है, सड़क बनवा दो, मैं नीचे के कमरे में जाता हूँ उनको बोलना मिनिस्टर साहब घर पे नहीं हैं । मिनिस्टर तो अंडरग्राउंड हो गए । लोग आये बोले- मंत्री साहब कहाँ है ? बोले- पापा ने कहा है कि मैं तो नीचे के कमरे में जाता हूँ वो गाँव वाले आयेंगे सिर खपायेंगे, लाइट नहीं है, सड़क बनवा दो, पानी की व्यवस्था करवा दो, मैं नीचे जाता हूँ तुम उनको समझा के रवाना कर देना, पापा ने ऐसा बोला है । बच्चा ज्यादा सुखी है, मंत्री इतना सुखी नहीं है, निर्दोष है बच्चा । नारायण हरि, निर्दोषता बड़ी चीज़ है ईश्वर के रास्ते में, सच्चाई । Honesty is the best policy .
 

तो जो कलंकी अवतार का धतिंग कर रहे हैं उनको हम सलाह देते हैं, वो सुनते होंगे, वो बड़ा ध्यान रखते हैं कि बापूजी हमारा तो कुछ नहीं बोलते । अब तुम्हारा बोल रहे हैं, विदीशा में जहाँ भी फिर से नया अड्डा डाला है तो फिर मैं वहां कुछ आदमी भेजूंगा नहीं तो फिर मैं दूसरे ढंग से, मैं तुमको नहीं बताऊंगा, जैसे पहले तुम पकड़े गए तुमको बताया नहीं और सारा तुम्हारा लिट्रेचर हाथ में आ गया । ऐसे ही अभी भी कुछ करूँगा या तो फिर तिहाड़ में भेजूंगा तुमको, अगर मेरे भक्तों को ठगने की साजिश बंद नहीं हुई तो तुम्हारे लिए तिहाड़ की जेल पक्की हो जाएगी । भोपाल.. तिहाड़.. जहाँ-जहाँ तुमने गुनाही काम किये ठगने के इसलिए सुधर जाओ तो सुधरने की सीजन है नहीं तो वापिस देख लेना क्या होता है ! ठीक है । ॐ नमो भगवते वासुदेवाय वासुदेवाय प्रीतिदेवाय माधुर्यदेवाय मम् देवाय प्रभुदेवाय कलंकीदेवाय । बोले ‘ देखो बापूजी ने कलंकीदेवाय बोला, वो टेप करके सुनायेंगे कि बापूजी ने कलंकी देवाय बोला मतलब कलंकी अवतार होना वाला है, बापूजी परीक्षा ले रहे हैं, चलो जलसा मनाओ । ’, ऐसा भी कर सकते हैं वो लोग लेकिन मैं तो टोंट मार रहा हूँ कलंकी देवाय बोल के, वो थोड़ी बताएँगे कि बापूजी ने टोंट मारने की बात कही, वो तो बस उतना बताएँगे कि बापूजी ने कलंकी देवाय बोला । लेकिन आप फ़िक्र मत करो बापू के आत्मदेव बड़े सतर्क हैं, साधकों को ठगने से बचाते रहते हैं । न ठगों न ठगाओ, न मूर्ख बनो न मूर्ख बनाओ, न दुखी रहो न दूसरों को दुखी करो । चलो प्रसाद बाटेंगे ज्योत से ज्योत जगायेंगे । ॐॐ सब तुम्हारी लीला ! वाह प्रभु वाह ! ॐॐॐॐ मानसिक जप करो और आनंद उभारो तब तक प्रसाद बांटने वाले प्रसाद बांटना शुरू करो । और ये सब बकवास है ऐसे लोगों के चक्कर में नहीं आना लेकिन विदीशा में जो आ रहे हैं, छिन्दवाड़ा में, भोपाल में, दिल्ली के होटल में भी मीटिंग की थी उन लोगों ने, कई वहां भी अपने साधकों को नोचा, दक्षिणा निकलवाई, अच्छे-अच्छे लोग । वो ऋषि.. निर्माण विभाग का वो भी अभी उसी ग्रुप में है, विनीत वो भी उसी ग्रुप में लग गया था, वो अब निकल गया बाहर और भी कई अपने आश्रम के संपर्क वाले कलंकी अवतार के विभाग में जुड़ गए । ये भी बापूजी की सेवा है और बोले ‘ बापूजी परीक्षा लेंगे, बापूजी बोलेंगे कि नहीं है मेरा तो उनको कसम डाल देते हैं कि किसीको बोलना नहीं, बापूजी कलंकी अवतार के प्रति तुम्हारी श्रद्धा तोड़ेंगे, परीक्षा लेंगे, ऐसा हिप्नोटाइज कर देते हैं । उनका ग्रुप भी बड़ा चालबाज़ बहुत जानता है । नारायण हरि, मच्छर को भी अक्ल देने वाला तो देता है न… बापू को ठेंगा दिखा के मच्छर भाग जाता है ऐसे ही ये मच्छर बिचारे कर लेते हैं खेल ।
 

कुल-मिला के क्या करना है ? जल्दी से जल्दी भगवद्सुख पा लेना है, भगवद्शांति पा लेना है, भगवद्ज्ञान पा लेना है और भगवान के नाते सच्चाई से, सरलता से, जो कुछ आये गलती-वलती, बता दे लिख के दे दे गुरूजी को कि ये हो रहा है, मेरे को बचाओ । मेरी गलती किसने बताई ? तो तुम और गलती में जाओगे, मेरे को बोलते बापूजी को क्यों बताया ? तो तुम्हारी बद्नीयत है, सुधरने की इच्छा नहीं है । बापू को किसने बताया ? बापू को किसने बताया ? जिसने बताया उसके पैर धो के पियो । नहीं !! उसको फिर टोकेंगे, ऐसे आदमी ईश्वर के रास्ते के ग्राहक नहीं होते, वो तो कीट-पतंग की योनी में जाने के ग्राहक होते हैं । नारायण हरि । ॐ नमो भगवते वासुदेवाय, वासुदेवाय प्रीतिदेवाय माधुर्यदेवाय मम् देवाय आत्मदेवाय प्रभुदेवाय प्यारेदेवाय ॐॐॐ ( कंठ से ) । 

 

ॐ शांति

श्री सदगुरुदेवजी भगवान की महा जयजयकार हो !

गलतियों के लिए प्रभुजी क्षमा करे ….  

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