Archive for the ‘Sant Asaram Bapu’ category

म्हारी नावडी दरिया मा डोले गुरूजी….

मार्च 8, 2007
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जीवन में सफ़लता (अनुभव)

सितम्बर 30, 2006

मैने तथा मेरी धर्मपत्नी ने २३ जनवरी २००२ को गोंदिया (महा.) में पूज्य सदगुरुदेव से मंत्रदीक्षा ली।

दीक्षा लेने के पूर्व मेरे स्वभाव एवं व्यवहार में चिडचिड़ापन था एवं मानसिक रूप से भी मैं काफी तनाव में रहता था, परंतु दीक्षा लेने के उपरान्त नियम का पालन करते हुए जप करने से मुझे जो शान्ति, प्रसन्नता, सूझबूझ व सफ़लता मिलती हए, उसका मैं बयान नहीं कर सकता। मेरे काफी अवगुण दूर हो गये हैं। जब भी मुझे कोई परशानी महसूस होती है तो मैं अपने गुरुमन्त्र का स्मरण करके रात्री में सो जाता हूँ, उस रात स्वप्न में पूज्य गुरुदेव अवश्य ही दर्शन देते हैं। वही मुस्कुराता, शांत-सौंम्य चेहरा नजर आता है और मेरी परेशानी का भी निदान हो जाता है।

मेरी धर्मपत्नी के व्यवहार में भी काफी परिवर्तन आया है।’सदगुरुदेव का आशीर्वाद सदा हमारे साथ है’ यही सोचकर हम रोज अपनी प्रतिदिन की दिनचर्या प्रारंभ करते हैं, जिससे हमें अपने कार्यों में सफ़लता एवं संतोष भी मिलता है।

रविकर्ण सिहं
(जबलपुर)

संतान प्रप्ति (अनुभव)

सितम्बर 30, 2006

सितम्बर १९९८ में पूज्य बापूजी के हिसार सत्संग कार्यक्रम में हम दोनों पति-पत्नी ने मंत्र दीक्षा ली थी।

उस समय हमारी कोई संतान नही थी, जबकि हमारी शादी को १४ वर्ष हो चुके थे। परन्तु पूज्य बापूजी की ऐसी कृपा हुई कि एक वर्ष बाद हमें गुरुपूर्णिमा पर्व के दिन पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई जिस का नाम हमने गुरुप्रीतिशरण रखा है।

पूज्य बापूजी की इस बालक पर इतनी कृपा है कि जहाँ कहीं भी टी. वी. पर बापूजी का सत्संग चल रहा होता है, यह वहीं खडे होकर सुनने लगता है। यह बालक हमें १४ वर्ष बाद प्राप्त हुआ है। मंत्र दीक्षा के पूर्व हम दोनों ने संतान प्राप्ति के लिये कहाँ- कहाँ की दवाइयाँ और ठोकरें नही खायी थीं।

महेश कुमार भारती
व्यास बाँध
तलवाडा टाउनशिप
पंजाब

कर्मयोग और कर्मबंधन

सितम्बर 19, 2006

आप व्यवहार में भगवान का सुमिरन करते हुए फ़ल की लोलुप्ता छोडते हुए कर्म करते है, तो उनके कर्म कि सुन्दरता बढ़ती है, जो अपने लिये नही करता वह बहुतों के काम आता है, आपके पास जो है वह आपके लिये नही है, हाथ में जो उठाने की शक्ति है तो वह मुंह को खिलाता है, तो औरों के नाम जो है उसका अंश अपने आप आपका भरण पोषण करेगा, इस प्रकार कर्म करो अपना स्वार्थ छोड़कर जिसमे बहुतों का मंगल हो, उस कर्म को प्रयत्नपूर्वक करो, जिस भी कर्म को करने से आपको शान्ति मिलती है वह कर्मयोग है और जिसको करने से टेन्सन मिलता है वह बन्ध, वाहवाही योग्य कर्म करो लेकिन वाहवाही की वासना करोगे तो बन्धन हो जायेगा, कुछ लोग भजन भी करते है तो ये मिल जाये, वो मिल जाये, तो वो बन्धन हो जाता है, हमे तो तेरी प्रीती मिल जाये बस, भगवान श्री कृष्ण जी कहते है, “भजताम‌ प्रीतिपूर्वकम्‌, ददामि बुद्धियोगम्‌ तम” ये दे दो वो दे दो, यह तो तुम भगवान को नौकरी दे रहे हो, मजदूर बना रहे हो उसको। हमेशा भिखमंगे बने रहो ऐसा नही चाहते है वो।

मैने अपने गुरुदेव से कभी कुछ नही मांगा, मुझे आत्मसाक्षात्कार करा दो, ये भी नही मांगा, लग गये बस, हमको मिटने वाले चीज़ों का मोह नही था। सच पूछो तो आप सभी शाश्वत सुख को चाहते हो लेकिन पता नही है। आप सदा सुख चाहते और सदा सुखस्वरूप वह चैतन्य आत्मा है। अनित्यानि शरीराणि।
क्या करिये क्या जोडिये, थोडे जीवन काज
छोड़ि छोड़ि सब जात है, देह गेह धन राज

जहा मौत की दाल नही गलती, दुःख का प्रवेश नही है, जिसको पाने के अलावा और कुछ नही है वह अनुभव आपका आत्मास्वरूप मन तू ज्योतिस्वरूप, अपना मूल पहचान।

जो भी कर्म करो भगवान का सुमिरन करते हुए, ४ बार नारायण नारायण नारायण नारायण का जप करो। नर-नारी के अयन, श्री नारायण। दुकानदार आये तो उसका मंगल हो और आपका गुजारा हो जाये। किसी अपराधी को सज़ा देनी है तो उससे उसका हित हो, ये नही कि किसी के कहने में आकर, कोई हमारे लिये गलत बोलता है तो हम उसके लिये कुछ बुरा नही सोचते, बुरा सोचकर हम अपना मन क्युं खराब करे। मैने ये किया, वो किया, मैने इतना किया, मै मन्दिर गया, आश्रम गया, लेकिन मुझे तो कुछ प्राप्त नही हुआ तो भाई ये तो आप फ़िर संसार को चाहते हो भगवान को नही, अच्छाई के कर्म करो लेकिन सूझबूझ रखके ऐसे नही जैसे एक बार एक जेल के लोगों ने रामलीला रखी तो हनुमान बने जिस कैदी को संजीवनी बूटी लाने को जेल के बाहर भेजा तो वह वापिस ही नही आया, अच्छा काम शास्त्र अनुरूप होना चाहिये, ऐसा नही कि कोई हमे उल्लु बना दे, इस ढंग से निष्काम कर्मयोग काम करने से पहले आराम, बाद में आराम लेकिन काम करते हुए भी आआराआअम्म्म्म्म, अब यहां जो भी सेवक है सब बस लगे ही रहते है, उनको सत्संग में आने का लालच नही बस लगे ही रहते है, लेकिन जो बेइमान होते है उनको थोडा होता है, लेकिन हमारे यहां तो ऐसे बेइमान सेवक ज़ीरो और ना के बराबर है, हमारा अनुशासन अच्छा है।

उत्तम सेवक सेवा खोज लेते है, मध्यम को संकेत करना पड़ता है, कनिष्ठ को आज्ञा देनी पड़ती है लेकिन कनिष्ठ तो बस ऊपर ऊपर की मलाई खाना चाहते है बस इससे तो तुम अपनी अध्यात्मिकता का ही नुक्सान करोगे बेटे।

एक पक्का करलो बस कि शरीर आपका नही है और संसार आपके साथ नही रहने वाला है तो आपका कर्म, कर्मयोग बन जायेगा, सारे शरीर जिसकी सत्ता से है, वह प्रभु मेरा है।

२ महिला जिनमें से एक अपने पति कि दी हुई नथ की तारीफ़ कर रही थी, उनकी बात सुनकर श्री कबीरजी ने कहा :
नथनि दीनि यार ने, स्मृति बारंबार
नाक दिया करतार ने, ताको दिया बिसार

तो भौतिकता में भगवान को मिला लिया, होना ये चाहिये कि भौतिकता में भगवान की सत्ता, माधुर्यता और करुणा को देखना शुरु कर दो, एक होती है प्रतिक्षा और एक होती है समीक्षा, प्रतिक्षा ऐसी वस्तु की की जाती है जो अभी मौजूद नही है। भगवान की दया कही दूर नही है उसकी समीक्षा करो, आपकी समीक्षा ईश्वर प्राप्ति करने वाली हो जायेगी, भगवान श्री कृष्ण जी वासुदेवजी के मन में, देवकी जी के तन में, नन्दबाबा के हाथों में थे लेकिन यशोद मां के हृदय से तो बार बार लगते थे। यशोदा माने, सारा यश भगवान को जो देती थी, ईश्वर तो फ़िर ईश्वर है, चाहे उनको अल्लाह कह दो या गाड। मेरे हृदय में किसी पार्टी, नेता से नफ़रत नही है, मै देखता हू कि मेरे हृदय में ऐसा कुछ न हो क्योंकि इससे मेरा ही नुक्सान है। “एक नूर ते सब जग उपजा, कौन भले कौन मन्दे”ये ऐसा है, वो ऐसा है, समझने के लिये थोडा सावधान हो जाओ, जो जैसा है वैसे व्यवहार में भिन्नता है लेकिन भीतर से नही हो तो तुम्हारा अध्यात्मिकरण हो गया।।