Archive for the ‘Satsang’ category

म्हारी नावडी दरिया मा डोले गुरूजी….

मार्च 8, 2007
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शक्ति का सदुपयोग

मार्च 8, 2007

सत्संग सुनते समय यह सिद्धान्त ले कर सुनना है कि हम जो सुनेंगे उसे अपने आचरण में लायेगें बस शास्त्रों मे लिखा है कि मात्र देवों भव पित्र देवों भव तैतरिय उपनिषद मे लिखा है ये वचन, महाराष्ट्र का पुण्डलीक नाम का विद्यार्थी उसने ये वचन सुना और अपने माता-पिता की सेवा की तो भगवान उसके आगे प्रकट हो गये और उनकी याद में अभी भी उस जगह पर मन्दिर बना हुआ है आज की तारीक में भी है वो मन्दिर पण्डरपुर महाराष्ट्र में। शास्त्र का वचन उसने माना, मातृ देवों भव: पितृ देवों भव: तो उसको शक्ति प्राप्त हो गयी भगवान प्रकट हो गये। तो शास्त्रों के वचन माननें से, गुरु के वचन मानने से साधक को शक्ति प्राप्त होती है। सिद्धि प्राप्त होती है। हमारे देश में जितने लोग सुबह सुबह अखबार पढ़ते है उतने लोग यदि भागवत गीता पढ़ने लग जाये , यौवन सुरक्षा जैसी पुस्तकें पड़ने लग जायें, सुबह सुबह ईश्वर की ओर पढ़े तो हमारा देश कितना उन्नत हो सकता है। देशवासी कितने उन्नत हो सकते है। जितना समय फिल्म के गीत सुनने में या गपशप में जात है उतना समय यदि शान्त बैठे तो, ध्यान करे तो, कितना उन्नत हो सकते है।

जितनी शक्ति क्रोध करने में खर्च होती है उतनी शक्ति को अगर हम बचायें गुस्सा ना करें तो ध्यान लग सकता है। पर लोगों को पता नही बेचारे अपनी शक्ति खर्च कर देते है, जितनी शक्ति आखों के द्वारा फ़िल्म देखने में खर्च कर देते है, उतनी शक्ति को अगर हम बचायें तो ध्यान लग सकता है, शक्ति खर्च कर देते है फिर अगर बैठे भी ध्यान पर तो नींद आ जाती है। इसलिये अपनी शक्ति को बचाना सींखे।

कर्मयोग और कर्मबंधन

सितम्बर 19, 2006

आप व्यवहार में भगवान का सुमिरन करते हुए फ़ल की लोलुप्ता छोडते हुए कर्म करते है, तो उनके कर्म कि सुन्दरता बढ़ती है, जो अपने लिये नही करता वह बहुतों के काम आता है, आपके पास जो है वह आपके लिये नही है, हाथ में जो उठाने की शक्ति है तो वह मुंह को खिलाता है, तो औरों के नाम जो है उसका अंश अपने आप आपका भरण पोषण करेगा, इस प्रकार कर्म करो अपना स्वार्थ छोड़कर जिसमे बहुतों का मंगल हो, उस कर्म को प्रयत्नपूर्वक करो, जिस भी कर्म को करने से आपको शान्ति मिलती है वह कर्मयोग है और जिसको करने से टेन्सन मिलता है वह बन्ध, वाहवाही योग्य कर्म करो लेकिन वाहवाही की वासना करोगे तो बन्धन हो जायेगा, कुछ लोग भजन भी करते है तो ये मिल जाये, वो मिल जाये, तो वो बन्धन हो जाता है, हमे तो तेरी प्रीती मिल जाये बस, भगवान श्री कृष्ण जी कहते है, “भजताम‌ प्रीतिपूर्वकम्‌, ददामि बुद्धियोगम्‌ तम” ये दे दो वो दे दो, यह तो तुम भगवान को नौकरी दे रहे हो, मजदूर बना रहे हो उसको। हमेशा भिखमंगे बने रहो ऐसा नही चाहते है वो।

मैने अपने गुरुदेव से कभी कुछ नही मांगा, मुझे आत्मसाक्षात्कार करा दो, ये भी नही मांगा, लग गये बस, हमको मिटने वाले चीज़ों का मोह नही था। सच पूछो तो आप सभी शाश्वत सुख को चाहते हो लेकिन पता नही है। आप सदा सुख चाहते और सदा सुखस्वरूप वह चैतन्य आत्मा है। अनित्यानि शरीराणि।
क्या करिये क्या जोडिये, थोडे जीवन काज
छोड़ि छोड़ि सब जात है, देह गेह धन राज

जहा मौत की दाल नही गलती, दुःख का प्रवेश नही है, जिसको पाने के अलावा और कुछ नही है वह अनुभव आपका आत्मास्वरूप मन तू ज्योतिस्वरूप, अपना मूल पहचान।

जो भी कर्म करो भगवान का सुमिरन करते हुए, ४ बार नारायण नारायण नारायण नारायण का जप करो। नर-नारी के अयन, श्री नारायण। दुकानदार आये तो उसका मंगल हो और आपका गुजारा हो जाये। किसी अपराधी को सज़ा देनी है तो उससे उसका हित हो, ये नही कि किसी के कहने में आकर, कोई हमारे लिये गलत बोलता है तो हम उसके लिये कुछ बुरा नही सोचते, बुरा सोचकर हम अपना मन क्युं खराब करे। मैने ये किया, वो किया, मैने इतना किया, मै मन्दिर गया, आश्रम गया, लेकिन मुझे तो कुछ प्राप्त नही हुआ तो भाई ये तो आप फ़िर संसार को चाहते हो भगवान को नही, अच्छाई के कर्म करो लेकिन सूझबूझ रखके ऐसे नही जैसे एक बार एक जेल के लोगों ने रामलीला रखी तो हनुमान बने जिस कैदी को संजीवनी बूटी लाने को जेल के बाहर भेजा तो वह वापिस ही नही आया, अच्छा काम शास्त्र अनुरूप होना चाहिये, ऐसा नही कि कोई हमे उल्लु बना दे, इस ढंग से निष्काम कर्मयोग काम करने से पहले आराम, बाद में आराम लेकिन काम करते हुए भी आआराआअम्म्म्म्म, अब यहां जो भी सेवक है सब बस लगे ही रहते है, उनको सत्संग में आने का लालच नही बस लगे ही रहते है, लेकिन जो बेइमान होते है उनको थोडा होता है, लेकिन हमारे यहां तो ऐसे बेइमान सेवक ज़ीरो और ना के बराबर है, हमारा अनुशासन अच्छा है।

उत्तम सेवक सेवा खोज लेते है, मध्यम को संकेत करना पड़ता है, कनिष्ठ को आज्ञा देनी पड़ती है लेकिन कनिष्ठ तो बस ऊपर ऊपर की मलाई खाना चाहते है बस इससे तो तुम अपनी अध्यात्मिकता का ही नुक्सान करोगे बेटे।

एक पक्का करलो बस कि शरीर आपका नही है और संसार आपके साथ नही रहने वाला है तो आपका कर्म, कर्मयोग बन जायेगा, सारे शरीर जिसकी सत्ता से है, वह प्रभु मेरा है।

२ महिला जिनमें से एक अपने पति कि दी हुई नथ की तारीफ़ कर रही थी, उनकी बात सुनकर श्री कबीरजी ने कहा :
नथनि दीनि यार ने, स्मृति बारंबार
नाक दिया करतार ने, ताको दिया बिसार

तो भौतिकता में भगवान को मिला लिया, होना ये चाहिये कि भौतिकता में भगवान की सत्ता, माधुर्यता और करुणा को देखना शुरु कर दो, एक होती है प्रतिक्षा और एक होती है समीक्षा, प्रतिक्षा ऐसी वस्तु की की जाती है जो अभी मौजूद नही है। भगवान की दया कही दूर नही है उसकी समीक्षा करो, आपकी समीक्षा ईश्वर प्राप्ति करने वाली हो जायेगी, भगवान श्री कृष्ण जी वासुदेवजी के मन में, देवकी जी के तन में, नन्दबाबा के हाथों में थे लेकिन यशोद मां के हृदय से तो बार बार लगते थे। यशोदा माने, सारा यश भगवान को जो देती थी, ईश्वर तो फ़िर ईश्वर है, चाहे उनको अल्लाह कह दो या गाड। मेरे हृदय में किसी पार्टी, नेता से नफ़रत नही है, मै देखता हू कि मेरे हृदय में ऐसा कुछ न हो क्योंकि इससे मेरा ही नुक्सान है। “एक नूर ते सब जग उपजा, कौन भले कौन मन्दे”ये ऐसा है, वो ऐसा है, समझने के लिये थोडा सावधान हो जाओ, जो जैसा है वैसे व्यवहार में भिन्नता है लेकिन भीतर से नही हो तो तुम्हारा अध्यात्मिकरण हो गया।।