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मंत्रो की शक्ति

जनवरी 31, 2013
24th Jan 2013 
Ahemdabad Ashram 
 
माघ मास के दिनों में सभी जल गंगा जल तुल्य हो जाते है | और इसको मनाने वाला व्यक्ति निरोग तो रहता ही है | ऋतू परिवर्तन हुआ तो शरीर में पित का प्रकोप न हो, खुजली की बीमारियाँ न हो | ३२ प्रकार की बीमारियाँ | पित और वायु मिलकर हार्ट अटेक होता है | तो शास्त्रों में लिखा है की भगवान कहते हैं की मैं तपस्या से, व्रत से, उपवास से जो कुछ पुण्य और प्रसन्नता देता हूँ, उससे भी ज्यादा पुण्य होगा माघ स्नान से | अपने शास्त्रों की सच्चाई कितनी ऊँची | माघ स्नान से आपका स्वास्थ और मानसिकता उन्नत होती है | इसीलिए भगवान बोलते हैं मैं प्रसन्न होता हूँ | 
जोगी मछेन्द्र्नाथ की कथा
अभी प्रयागराज में कुम्भ मेला चल रहा है | त्रिवेणी घाट पर लोग नहाते हैं | पूर्वकाल में त्रिवेणी घाट पर राजा का शव | धर्मात्मा राजा प्रजा के बड़े प्रेमी थे | मरण धर्मा शरीर तो मरता ही है, राजा का हो चाहे प्रजा का | राजा मर गया, उसके शव के साथ उसकी रानी कुड्डी की नाई विलाप करती-करती सती होने को अपने पति की श्मशान यात्रा में | जोगी मछेन्द्र नाथ और उनके शिष्य गोरखनाथ से ये दुखद प्रसंग सहा नहीं गया | तो जोगी गोरखनाथ ने कहा की गुरूजी राजा को जीवित किया जाये | नही तो रानी सती हो जायेगी, राजा तो मृत्यु धर्म को प्राप्त हुए | अधिकारी प्रजा का उत्पीड़न करेंगे | राजा के बिना प्रजा का बड़ा अहित होगा | उसके लिए राजा को वापिस बुलाया जाये | तो क्षण भर शांत हुए जोगी मछेन्द्र नाथ | उन्होंने कहा वत्स राजा बड़ा धर्मात्मा था | और ॐकार का उच्चारण करने वाला व्यक्ति, इस ब्रह्मांड को लाँघ कर अनंत ब्रह्मांड से जुड़ जाता है | तो राजा इस ब्रह्मांड में नही है | धर्मात्मा राजा है और ॐकार का उच्चारण करने वाला साधक है | तो इस ब्रह्मांड को लाँघ कर चला गया तो उसको बुलाना सम्भव नही रहा | तो गोरखनाथ ने कहा गुरूजी मैं अपना ये शरीर कहीं रख देता हूँ और उसके शरीर में प्रविष्ट होकर उसे जीवित करता हूँ | मछेन्द्र नाथ ने कहा वत्स, वत्स माने पुत्र, तुम युवा हो और ये साहस की सेवा तुम, झंझट में मत पडो | रानी के भरतार बनना फिर रानी के साथ, तुम्हारे लिए ये उचित नही रहेगा | ये मैं झंझट मोल लेता हूँ | मेरा शरीर यहाँ रखूँगा और शुक्ष्म शरीर से राजा में प्रविष्ट होऊँगा, राजा जीवित होगा | लेकिन तुम मेरे शरीर की निगरानी रखना | जो आज्ञा गुरूजी | मछेन्द्र नाथ अपने सुव्यवस्थित जगह पर ध्यानस्त होगये और शरीर से बाहर आये | शुक्ष्म शरीर से राजा में प्रविष्ट होते ही राजा में हेलचाल हुई | सारी गमी, सारा मातम, सारा दुःख, खुशी और उत्सव में बदल गया | दिन बीते, सप्ताह बीते, महीनों की कतारे बीती | अब एक जगह पर चौकी करना गोरखनाथ के बश का नही रहा | तीर्थ यात्रा करने को निकले | वहाँ के पुजारन को कम सौपा के इस कमरे को, जबतक मैं लौट के नही आता हूँ, १२ साल पुरे होंगे गुरूजी को, तबतक इस कमरे को कोई छुए नही ध्यान रखना | अब मछेन्द्र्नाथ तो गए राजा के शरीर में | राजा के शरीर में तो गए लेकिन थे तो वो जोगी | तो राजा के पूर्व स्वभाव और दूसरे के स्वभाव में फर्क तो पड़ता है | रानी बुद्धिमति थी | और राजा-रानी नजिक होते तो एक-दूसरे को अपने बचपन की बाते बता देते हैं पति-पत्नी को | तो मछेन्द्र्नाथ ने कह दिया होगा के तेरा पति तो मर गया लेकिन तेरी दीन हालत देखकर हम ऐसे आये और फलानी जगह पर मैं अपना शरीर रख दिया हूँ | १२ साल तेरे साथ रहूँगा | दिव्य सन्तान दूँगा | जो भी कहा होगा, मैं अपने अनुमान से कह रहा हूँ | तो उनको सन्तान हुई | ये कामवासना से तो शादी नही हुई थी | प्रजा का पालन करना ये धर्म भाव से, ये बच्चे का नाम, ये नाथ सम्प्रदाय के थे | तो बच्चे का नाम रखा धर्मनाथ | प्रयागराज के राजाओ के इतिहास में नाथ राजा का नाम आता है | वो मछेन्द्र्नाथ ने रानी पर कृपा करके दिया हुआ | 
अभी भी माघ महीने की द्वितीय को धर्मनाथ की याद में धर्म द्वितीय करके मनाते हैं लोग | द्वितीय तिथि आएगी माघ मास की तो उसको धर्म द्वितीय बोलते हैं | तो रानी ने मछेन्द्र्नाथ की घटना जान ली | वो लड़का १२ साल का हुआ | तो मछेन्द्र्नाथ ने उसको राजतिलक करवा दिया | और फिर अपने शरीर में प्रविष्ट होने गए | कथा तो बड़ी आश्चर्य कारक है | के ज्यों रानी को पता चला के मछेन्द्र्नाथ का शरीर वहाँ पर पड़ा है | ये चले जायेंगे तो मैं फिर विधवा हो जाऊँगी | तो रानी थी, शत्रानी थी, कैसे भी करके उसने पुजारन को दबोच लिया या घुस दी | के कमरा खोलकर मछेन्द्र्नाथ के शरीर के ७ टुकड़े करवा दिए | कैसा संसार ? ७ टुकड़े करवा दिए ताकि मछेन्द्र्नाथ अपने शरीर में वापिस ना जाएँ | मेरा सुहाग बना रहे | जोगी गोरखनाथ लौट के आये तो देखा के गुरूजी के शरीर तो अभी है ही नही | ध्यान लगा के देखा के ७ टुकड़े करवा दिए | लेकिन गुरूजी संकल्प करके गए थे तो भगवन का मंत्र-व्न्त्र करके गए थे तो जोगिनियाँ रखवाली कर रही थी | जोगिनियाँ कैलाश ले गयी | गोरखनाथ फिर वहाँ कैलाश पहुंचे | और अपने योगबल से ७ टुकडों में चेतना प्रविष्ट करवा के और म्छेन्द्र्नाथ का शरीर पूर्व व्रत हो गया | और जब म्छेन्द्र्नाथ को आना था तो उस शरीर में प्रविष्ट हो गए | और राजा जल पड़ा | ये कथा ज्ञान वर्धक तो है | योग सामर्थ सम्पन तो है | 
ऐसी ही एक दूसरी कथा भी है | यात्रा करते-करते जोगी मछेन्द्र्नाथ, गोरखनाथ आये तालाबों के किनारे | गाँव से थोडा हट के कुछ तालाब था | शांत वातावरण था | गाँव का नाम था कनक गाँव | मध्यप्रदेश में | वत्स यहाँ तुम संजीवनी मंत्र सिद्ध करो | म,मंत्र में बड़ी शक्ति होती है | और बिज मंत्र २१ होते हैं | उसमें तो अद्भुत शक्ति होती है | सूर्यनारायण में ये ४ बिज मंत्र जोड़े हैं | कैसा भी आदमी हो, बिज मंत्र बच्चे पढ़े, तो कैसे भी बच्चे हो तेजस्वी हो जायेंगे | ॐ ह्रां ह्रीं सह सूर्याय नमह || ऐसा मंत्र जपे और सूर्य नारायण का भरू मध्य में ध्यान करे | बड़े बुद्धिमान हो जायेंगे | बाल संस्कार वालों को भी कराया जा सकता है | ४ बिज मंत्र हैं | 
कोई खतरनाक आपदा आ गयी हो, चारो तरफ से मुसीबत में घिर गया हो तो फिर ३ दूसरे बिज मंत्र हैं, वो जप करें तो सरे विपदा वाले एक तरफ | आप सफल हो जायेंगे | ऐसे ॐकार मंत्र की अपनी शक्ति है | तो ॐकार मंत्र तो कई बिज मंत्रो के साथ भी लगता है | जैसे श्री कृष्ण का नाम तो वैसे ही भगवान का नाम है लेकिन बिज मंत्र लगता है तो वो नाम भी विशेष और प्रभावशाली होता है | जैसे कृष्ण-कृष्ण ये तो अकेला नाम है, कलीम कृष्णाय नमह और प्रभावशाली हो जायेगा ज्यादा | राम-राम अच्छा मंत्र है | रामजी के प्राकट्य के पहले वेदों में इसकी महिमा आती है | राम के रकार से सूर्य तत्व और मकर से चन्द्र तत्व शरीर में विकसित होता है | हाई बी.पी., लो बी.पी. से बचाता है और अध्यात्मिक उन्नति कराता है राम नाम मंत्र | लेकिन उस राम मंत्र में ह्रीं मिला दो तो बिज मंत्र होता है ह्रीं | ऐसे ही बम-बम शिवजी का बिज मंत्र है | तो बम-बम सवा लाख जप करे तो शिवरात्रि के दिन तो गठिया ठीक हो जाता है | किसी को हो गया उसने किया तो मुझे बताया के बापू आपके सत्संग से सुनके मेरा गठिया ठीक हो गया | घुटनों का दर्द, वायु ये सब बीमारी मिटाना है तो बम-बम जप करो | 
तो एकांत में कनक गांव जोगी गोरखनाथ साधना करते थे, जप करते थे | संजीवनी विद्या का, बिज मंत्रो का जो भी | बच्चे कभी खेलने आ जाते तो तलाव की चिकनी-चिकनी मिटटी लेकर बच्चो ने बैल-गाड़ी बनाई | देहात के बच्चे थे तो बैल-गाड़ी का मोडल बनाया | बैल-गाड़ी तो बन गयी, बैल भी खड़े हो गए लेकिन चालक बनाने में बच्चे विफल हो रहे थे | तो जोगी गोरखनाथ पर नजर पड़ी | तो सब बच्चे बोले बाबा, बैल-गाड़ी तो हमने बना दी, मिटटी तो हम लाकर देते हैं ढेर | एक मनुष्य बना दो हम बैल गाड़ी पर उसको बिठाएंगे | बाबा ने उनको समझाया के ये सब हम नही करते, नही जानते | बहुत आग्रह किया तभी बाबा ने उनको समझा के भेज दिया | दूसरे दिन सुबह आ गए फिर | हम तो नही बना पते बाबा आप कैसे भी हो हमको भले छोटा बना दो | बच्चा ही बना दो | हमलोग चलते हैं बैलगाड़ी, बच्चे हैं तो | बहुत बच्चों ने बाल हट किया तो, नम्रता किया तो जोगी गोरखनाथ के मन में आगयी दया | तो उसने मिटटी लेकर एक पुतला बनाया | बच्चे का पुतला बनाने में लगे | लेकिन उनको पता ही नही था मैं इस संजीवनी मंत्र का अनुष्ठान क्र रहा हूँ तो अनुष्ठान का ऐसा प्रभाव होता है | 
हमारे छिंदवाडा आश्रम में रहने वाली बच्चियाँ हरी ॐ का अनुष्ठान करती हैं तो ॐ है तो उनके जप के प्रभाव से, बैंगन को पानी पिलाती हैं तो, फिर बैंगन काटती हैं तो उसमें से ॐ निकल आता है, आकृति | कई महिलाए भोजन बनती हैं, हरी ॐ, ॐ जप है उनका तो भोजन में रोटी के उपर ॐ उभर आता है | ॐ बिज मंत्र का अकाट्य प्रभाव होता है | ये बहुत ऊँची उपलब्धि है, उपासना के जगत में | साक्षात्कार तो परम ऊँचा है लेकिन ये भी अच्छी, सात्विक ऊँचाई है | 
तो जोगी गोरखनाथ वो पुतला बनाते गए और संजीवनी विद्या का मंत्र पढ़ते गए | तो ज्यों पुतला तैयार होने को है तो उसमें हेल-चाल होने लगी | पूरा बनाया तो वो बच्चा, बच्चे कई जो चेष्टा होती है वो हुई | भूत-भूत …गाँव में भाग गए | कनक गाँव में खबर पड़ी लोग आये बोले कैसे ? गाँव वालों ने देखा गोरखनाथ के संजीवनी मंत्र के प्रभाव से ऐसा हो गया है | 
मधु नाम के ब्राह्मण थे और उनकी पत्नी थी गंगा | उनको सन्तान नही होती थी | उनके मन में हुआ की जोगी ने जो सन्तान बनाई वो हमको मिल जाये तो कितना अच्छा | रात भर वही विचार और स्वप्ने चलते रहे | सुबह को आये जोगी के आगे प्रार्थना किया  | तो बोले अच्छा तुम तैयारी करो और हम धाम-धूम से ये बालक आपको गोद देते हैं | कभी-कभी हम आयेंगे उस बालक को संस्कार देंगे | लेकिन ये बालक तुम्हारे घर में सदा नही रहेगा | ये तुम्हारी ७ पीढियाँ तार देगा | बालक का नाम घहेनिनाथ रख दिया | चौरासी सिद्धो में घहेनिनाथ एक सिद्ध पुरुष हो गए | भारत के कैसे-कैसे योगी हुए | 
हेलिकॉप्टर लोगो के बीच गिरा | उसके पुर्जे-पुर्जे हो गए | किसीको चोट नही लगी | सफेद पेट्रोल आग पकड़ने वाला होता है | आग भी निकली, पेट्रोल भी बहा, लेकिन पेट्रोल और आग के बीच में कैसे म,मंत्र रक्षा, आग नही लगी | आग लगती तो हम सब स्वाह हो जाते | तो ना हमको चोट लगी, हमारे साथ जो भक्त थे ना उनको चोट लगी | हेलिकॉप्टर पब्लिक के बीच गिरा था | सब दौड़ते हुए दीखते हैं | उनको भी कोई पुर्जा उड़के नही लगा | अगर छोटा सा भी पुर्जा उड़ के लगता तो घायल हो जाते लोग | बिना चोट के यात्रा हो ऐसा ॐ त्रय्मभक्म यजामहे सुगंधिम पुष्टि वर्धनम, मैंने वो मंत्र नही किया था लेकिन कोई घर से निकले और वो जप करे तो एक्सीडेंट से सुरक्षित हो जायेगा | ऐसा मंत्रो की शक्ति है | शादी-विवाह होता है, कोई बड़ा काम है, कोई बारात लेकर जा रहे हो, कोई जंगल है या कुछ भी है | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय की एक सौ आठ बार आवृति कर लो | एक माला जपो तो तुम्हारा शादी-विवाह या कोई बड़ा कार्यक्रम है तो उसमें विघ्न आयेंगे तो उसी समय उसी मंत्र को फिर से दोहरा दो | वासुदेव तो सर्वत्र है | सुरक्षा कर लेंगे | रक्षा कवच ॐ नमो भगवते वसुदेवाए || तो घेमिनाथ, गोरखनाथ और म्छेन्द्र्नाथ आते-जाते रहे कनक गाँव में | दीक्षा दिया, जप और ध्यान सिखाया | 
प्राणायाम
अब बाये से स्वास लिया दाये छोड़ा, दाये से लिया बाये छोड़ा | २-४ अनुलोम-विलोम प्राणायाम किया | जब स्वास लें तो उसमें ॐ स्वरूप इश्वर का नाम भरना है | स्वास लो और ॐ, ॐ परमात्म नमह २-५ बार फिर स्वास निकल दो | ऐसे २-५ प्राणायाम किया फिर दोनों नथुनों से स्वास लो | ये ॐकार मंत्र है, गायत्री छंद है, परमात्मा ऋषि हैं, अन्तर्यामी देवता हैं | हम इसका जप करते हैं बुद्धि शक्ति विकसित करने के लिए | ॐ….कंठ से उच्चारण कीजिये | ये २ बार करके फिर भगवान की, गुरु की, ॐकार की मूर्ति के सामने देखना है | आँखों की पलके ना हिले | एक मिनट अगर आँखों की पलके ना हिले ऐसे देखते हो तो मन एकाग्ढ़ होने लगेगा | अथवा दूसरा तरीका है उपर के दांत थोड़े उपर और नीचे के दांत थोड़े नीचे | होंठ बंद | जीभ उपर नही, नीचे नही बीच में खड़ी रखे | और देखते रहे | अगर आँखे बंद करनी है तो कर सकते हैं | और वहाँ जीभ पर मन लगा लो | १ मिनट और जीभ बीच में स्थिर हो गयी तो मन एकाग्र होने लग जायेगा | और एकाग्रता से सारी समस्याओं का समाधान हो जाता है | आत्मा की शक्ति आती है मन में | निर्णय शक्ति, विचार, ये-वो सब विकसित हो जाता है | तीसरा है पैर के अंगूठे २ उँगलियों से अच्छी तरह पकड़े | और फिर अंगुठो के नाख़ून पर दृष्टि जमा दी | मन शांत होने लगेगा | चौथा है टंक विद्या | थोड़ी देर करके जप करे तो मन अपने आप शांत हो जायेगा | पाँचवा है लम्बा स्वास लो ॐ का प्लुत उच्चारण करो | ऐसे प्लुत उच्चारण करते रहे, एकटक देखते रहे | पलके हिले ना हिले, १५ मिनट के बाद म,न में आत्मिक संचार के दिव्य सद्गुण और शरीर में आरोग्य के कण बनेंगे | और भगवान प्रसन्न होंगे | क्योंकी ये ॐकार मंत्र के देवता अन्तर्यामी परमात्मा हैं | इस ॐकार मंत्र की शक्तियाँ खोजने वाले भगवान नारायण स्वयं हैं | ॐकार मंत्र की छंद गायत्री है | जिसमें भी भागवत प्रभाव होता है मंत्र में उसकी छंद गायत्री हो जाती है | तो ॐकार मंत्र है, गायत्री छंद है, परमात्मा ऋषि हैं, अन्तर्यामी देवता हैं | क्यों जपते हो ईश्वर प्रीति अर्थे | अथवा सद्बुद्धि प्राप्ति अर्थे | अथवा आरोग्य प्राप्ति अर्थे | जप करते समय फिर तरीका ये भी है | दोनों कण में ऊँगली डालो | घर स्वास लो ॐ स्वरूप ईश्वर का नाम भरो उसमें | स्वास रोको, मैं भगवान का भगवान मेरे हैं | मैं स्मृति, प्रीति अन्तर्यामी में बढ़ाने के लिए जप करता हूँ | ॐ कंठ से उच्चारो | प्यार से | ॐ…..| 
ऐसा सुबह, दोपहर, शाम करने से प्रसन्नता बनी रहेगी, संसार में सहेज सफलता और ईश्वर प्राप्ति भी सहेज | 
गोविन्द हरे, गोपाल हरे, सुखधाम हरे, आत्मराम हरे || – कीर्तन – गोविन्द हरे, गोपाल हरे, जय-जय प्रभु दीनदयाल हरे, सुखधाम हरे, आत्मराम हरे || हरी ॐ……
ऐसी संतो की संगत रहे तो दुःख-चिंता नही रहती | 
योग्व्शिष्ट
हे रामजी जिसका आत्मज्ञान रूपी सूर्य उदय हुआ है, उसीका जन्म और कुल सफल होता है |
बापूजी :  जिसके हृदय में आत्मज्ञान उदय हुआ है, उसका जीवन सफल है | बाकि तो इंद्र बनने के बाद भी कुछ नही | पी.एम्., की.एम्. होने के बाद भी कुछ नही, धोखा है | 
जो पुरुष आत्मचिंतन का अह्यास करता है, वही शांति पाता है | बुद्धि श्रेष्ठ और सत्शास्त्र वही है जिसमें संसार से वैराग्य और आत्म तत्व की चिंतन उपजे | जब जिव आत्म पद को पाता है, तब उसके सरे क्लेश मिट जाते हैं | और जिसकी आत्मचिंतन में रूचि नही वे महा अभागी हैं | 
बापूजी :  अभागे हैं जिनको आत्मचिंतन में रूचि नही है | परमात्मा शांति नही पाते | ये खाऊ, इधर जाऊ, बड़े अभागे हैं | 
बम्बई से ७०-७५ किलोमीटर दुरी पर गणेशपुरी है | हमारे गुरूजी एकांत में व्भन | किसी का बंगला था | फोरेस्ट जैसा माहोल था | वहाँ रहे थे तब मैं उधर गया था | वहीं साक्षात्कार हुआ| तो वहाँ मुक्तानान्दजी का आश्रम है | मुक्तानान्दजी के गुरु थे नित्यानंदजी | लोग बहुत सम्पर्क किये फिर उब गए | नानकजी भी ऐसे ६० साल की उम्र में तो लोगो को भगाने के लिए पत्थर मरते, उग्र रूप धारण कर लिया | भीड़-भाड समय बर्बाद करते हैं | ऐसे लोग खुद का भी समय बर्बाद करते हैं संतो का समय भी बर्बाद करते हैं | ऐसे लोगो से बचने के लिए नानकजी ने उग्र रूप धारण किया पत्थर मारते थे | ऐसे मुक्तानंद के गुरु नित्यानंद भी पत्थर मारते थे | वे सत्संग को मनोरंजन में खत्म करने वाले पापी लोग होते हैं | जो दूसरों का सत्संग बिगाड़ते हैं, आज्ञा नही मानते है वे पापी लोग होते हैं | मंदा सु मंद मत्या मंद मती के होते हैं, दुर्बुद्धि होती है जो गुरु की बात को हँसी-मजाक में ले लेते हैं | गुरु की आज्ञा का आदर नही करते | 
बाकें बिहारी भगवान के पास गए भगत | हे भगवान मुझे सुख दो | भगवान ने सोचा इसको सुख चाहिए तो मैं तो सुख देने को तैयार हूँ | शांत सुख चाहिये, अथवा हृदय में मेरी वार्ता का सुख चाहिये जो भी सुख है मैं दे सकता हूँ | मेरे पास सुख ही सुख है | सुख पूर्वक वायु बहता है | सुख पूर्वक गंगाजी बहती हैं | सुख पूर्वक नैनो से संतो के अथवा भगवान के वाएबरेष्ण निकलते हैं | लेकिन वो भगत बोले मुझे सुख दो | भई कैसा सुख चाहिये ? बोले मुझे पुत्र का सुख चाहिये | तो भगवान सोच में पद गए | सीधा सुख मांगते तो अभी दे देता | मुस्कान से, शांति से, अंदर में, आत्मा में | अब इसको पुत्र का सुख चाहिये | तो देखना पडेगा इसके प्रारब्ध में क्या है | तो बोले भगवान जल्दी मुझे पुत्र प्राप्ति हो | भगवान को डिस्टर्ब कर दिया | भगवान देखे, सोचे, जल्दी पुत्र प्राप्ति हो | जल्दी कैसे करें सुख दें तो बोले सुंदर होना चाहिये | पुत्र भी चाहिये सुंदर भी होना चाहिये | एक वर्ष के अंदर दे देना | बुद्धिमान भी हो | और आज्ञाकारी भी हो | दबंग भी हो और कहने में भी चले | भगवान अब चुप रह गए | बोले ये तो मेरेको नौकर भी ऐसा बनाता है की मैं फेल हो जाऊ | लड़की आई मुझे ऐसा पति मिले शेर जैसा | और मेरे कहने में चले | अब शेर जैसा और कहने में कैसे चलेगा | आदमी आया मुझे शादी हो, लडकी बड़ी खुबसुरत हो | स्वर्ग की परी जैसी सुंदर मिले तब मैं खुश होऊंगा | लेकिन ये ध्यान रखना प्रभु उसकी तरफ कोई बुरी नजर से देखे नही | अरे पागल सुंदर होगी तो लोग देखेंगे | अब ठाकुरजी को भी ऐसा कर देते हैं के ठाकुरजी नौकर बनके भी उनकी सेवा करे तो फेल हो जाये | फिर ठाकुरजी बोलते हैं जाओ मरो | बकते रहो, प्रार्थना करते रहो | बाकि जो प्रेमी होते हैं उनसे तो रूबरू हो जाते हैं | कभी प्रेमी ठाकुरजी के पास जाते हैं तो कभी ठाकुरजी प्रेमी के पास आ जाते हैं | लेकिन जो भिखमंगे होते हैं न ऐसा दो, ऐसा दो | जख मार-मार के थको | संत भी, ठाकुरजी भी उपराम हो जाते हैं | 
फिर बद का पेड़ लगा दो जाओ उधर फेरे फिरो | ऐसे लोगो से जान छुडाने के लिए जाओ | भगवान से प्रेम करो तो प्रेम स्वरूप भगवान प्रकट हो जाये | लेकिन भगवान को गुलाम का गुलाम बना देते हैं | धन चाहिए और इतने समय में चाहिये | मकान चाहिए और ऐसा चाहिए | इच्छा से खुद भी प्रेषण और संत और भगवान को भी परेशान करते हैं | इच्छा नही है तो भगवान और उनका आत्मा एक साथ | गुरु का आत्मा और तुम्हारा आत्मा एकसाथ | 
 
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श्री कृष्ण की गुरुसेवा

अप्रैल 13, 2007

गुरु की महिमा अमाप है, अपार है । भगवान स्वयं भी लोककल्याणार्थ जब मानवरुप मे अवतरित होते है तो गुरुद्वार पर जाते है ।

Shri Krishna receiving instructions from His Sadguru

राम कृष्ण से कौन बडा, तिन्ह ने भि गुरु किन्ह ।

तीन लोक के है धनी, गुरु आगे आधीन ॥

द्वापर युग में जब भगवान श्री कृष्ण अवतरित हुए एवं कंस का विनाश हो चुका, तब श्री कृष्ण शास्त्रोक्त विधि से हाथ मे समिधा लेकर और इन्द्रियों को वश में रख कर गुरुवर संदीपनि के आश्रम में गये। वहा वे भक्तिपूर्वक गुरु की सेवा करने लगे । गुरु आश्रम में सेवा करते हुए, गुरु संदीपनि से भगवान श्री कृष्ण ने वेद-वेदांग, उपनिषद, मीमांसादि षडदर्शन, अस्त्र-शस्त्रविद्या, धर्मशास्त्र एवं राजनीति आदि की शिक्षा प्राप्त की । प्रखर बुद्धि के कारण उन्होने गुरु के एक बार कहने मात्र से ही सब सिख लिया । विष्णुपुराण के मत से चौसठ दिन में ही श्री कृष्ण ने सभी चौसठो कलाए सीख ली ।

जब अध्ययन पूर्ण हुआ, तब श्री कृष्ण ने गुरु से दक्षिणा के लिये प्रार्थना की: ” गुरुदेव! आज्ञा कीजिए, मैं आपकी क्या सेवा करू ?”

गुरु: “कोई आवश्यकता नही है ।”

श्री कृष्ण: ” आपको तो कुछ नही चाहिये, किन्तु हमे दिये बिना चैन नही पडेगा । कुछ तो आज्ञा करे ।

गुरु: “अच्छा जाओ, अपनी माता से पूछ लो । श्री कृष्ण गुरु-पत्नी के पास गये एवं बोले: “माँ ! कोई सेवा हो तो बताइये ।” गुरु पत्नि भी जानती थी कि श्री कृष्ण कोई साधारण मानव नही बल्कि स्वयं भगवान है, अतः वे बोली : “मेरा पुत्र प्रभाष क्षेत्र में मर गया है । उसे लाकर दे दो ताकि मै उसे पयपान करा सकू ।”

श्री कृष्ण :” जो आज्ञा ।”

श्री कृष्ण रथ पर सवार होकर प्रभाष क्षेत्र पहुचे और वहां कुछ देर ठहरे । समुद्र ने उन्हे परमेश्वर जानकर उनकी यथायोग्य पूजा की ।

श्री कृष्ण बोले: “तुमने अपनी बड़ी बड़ी लहरॊ से हमारे गुरुपुत्र को हर लिया था । अब उसे शीघ्र लौटा दो ।”

समुद्र: ” मैने बालक को नही हरा है, मेरे भीतर पान्चजन्य नामक एक बड़ा दैत्य शंख रूप मे रहता है, निःसन्देह उसीने आपके गुरुपुत्र का हरण किया है ।”

श्री कृष्ण ने तत्काल जल के भीतर घुसकर उस दैत्य को मार डाला, पर उसके पेट में गुरुपुत्र नही मिला । तब उस्के शरीर से पान्चजन्य शंख लेकर श्री कृष्ण जल से बाहर आये एवं यमराज की संयमनी पुरी में गये । वहाँ भगवान ने उस शंख को बजाया । कहते है कि उस ध्वनि को सुन कर नारकीय जीवों के पाप नष्ट हो जाने से वे सब वैकुंठ पहुँच गये । यमराज ने बड़ी भक्ति के साथ श्री कृष्ण की पूजा की और प्रार्थना करते हुए कहा: “हे लीलापुरुषोत्तम ! मै आपकी क्या सेवा करुँ?”

श्री कृष्ण :” तुम तो नही पर तुम्हारे दूत, कर्मवश हमारे गुरुपुत्र को यहाँ ले आये है। उसे मेरी आज्ञा से वापस दे दो । ‘तथास्तु’ कहकर यमराज उस बालक को ले आये । श्री कृष्ण ने गुरुपुत्र को, जैसा वह मरा था वैसा ही उसका शरीर बनाकर, समुद्र से लाये हुए रत्नादि के साथ गुरुचरणों में अर्पित कर के कहा, “गुरुदेव ! और भी जो कुछ आप चाहे, आज्ञा करे ।”

गुरुदेव : “वत्स ! तुमने गुरुदक्षिणा भली प्रकार से संपन्न कर दी । तुम्हारे जैसे शिष्य से गुरु की कौन सी कामना अवशेष रह सकती है ? वीर अब तुम अपने घर जाओ । तुम्हारी कीर्ति श्रोताओ को पवित्र करे और तुम्हारे पड़े हुए वेद नित्य उपस्थित और श्रवण रहकर इस लोक एवं परलोक में तुम्हारे अभिष्ट फल को देने मे समर्थ हो। गुरुसेवा का कितना सुन्दर आदर्श प्रस्तुत किया है श्री कृष्ण ने ! थे तो भगवान, फिर भी गुरु की सेवा उन्होने स्वयं की है ।

सतशिष्यों को पता होता है कि गुरु की एक छोटी सी सेवा करने से सकामता निष्कामता में बदलने लगती है, खिन्न ह्रदय आनन्दित हो उठता है, सुखा ह्रदय भक्ति रस से सराबोर हो उठता है । गुरुसेवा में क्या आनन्द आता है, यह तो किसी सतशिष्य से ही पूछकर देखे ।

चेतना के स्वर ( भाग-१ )*

अप्रैल 11, 2007

चेतना के स्वर ( भाग-१ )
*Courtesy:www.hariomgroup.org

चेतना के स्वर ( भाग-२ )

अप्रैल 11, 2007

चेतना के स्वर ( भाग-२ )
Courtesy:www.hariomgroup.org

ये कैसा हैं जादु समझ मे ना आया !!

मार्च 8, 2007

जीवन में सफ़लता (अनुभव)

सितम्बर 30, 2006

मैने तथा मेरी धर्मपत्नी ने २३ जनवरी २००२ को गोंदिया (महा.) में पूज्य सदगुरुदेव से मंत्रदीक्षा ली।

दीक्षा लेने के पूर्व मेरे स्वभाव एवं व्यवहार में चिडचिड़ापन था एवं मानसिक रूप से भी मैं काफी तनाव में रहता था, परंतु दीक्षा लेने के उपरान्त नियम का पालन करते हुए जप करने से मुझे जो शान्ति, प्रसन्नता, सूझबूझ व सफ़लता मिलती हए, उसका मैं बयान नहीं कर सकता। मेरे काफी अवगुण दूर हो गये हैं। जब भी मुझे कोई परशानी महसूस होती है तो मैं अपने गुरुमन्त्र का स्मरण करके रात्री में सो जाता हूँ, उस रात स्वप्न में पूज्य गुरुदेव अवश्य ही दर्शन देते हैं। वही मुस्कुराता, शांत-सौंम्य चेहरा नजर आता है और मेरी परेशानी का भी निदान हो जाता है।

मेरी धर्मपत्नी के व्यवहार में भी काफी परिवर्तन आया है।’सदगुरुदेव का आशीर्वाद सदा हमारे साथ है’ यही सोचकर हम रोज अपनी प्रतिदिन की दिनचर्या प्रारंभ करते हैं, जिससे हमें अपने कार्यों में सफ़लता एवं संतोष भी मिलता है।

रविकर्ण सिहं
(जबलपुर)

संतान प्रप्ति (अनुभव)

सितम्बर 30, 2006

सितम्बर १९९८ में पूज्य बापूजी के हिसार सत्संग कार्यक्रम में हम दोनों पति-पत्नी ने मंत्र दीक्षा ली थी।

उस समय हमारी कोई संतान नही थी, जबकि हमारी शादी को १४ वर्ष हो चुके थे। परन्तु पूज्य बापूजी की ऐसी कृपा हुई कि एक वर्ष बाद हमें गुरुपूर्णिमा पर्व के दिन पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई जिस का नाम हमने गुरुप्रीतिशरण रखा है।

पूज्य बापूजी की इस बालक पर इतनी कृपा है कि जहाँ कहीं भी टी. वी. पर बापूजी का सत्संग चल रहा होता है, यह वहीं खडे होकर सुनने लगता है। यह बालक हमें १४ वर्ष बाद प्राप्त हुआ है। मंत्र दीक्षा के पूर्व हम दोनों ने संतान प्राप्ति के लिये कहाँ- कहाँ की दवाइयाँ और ठोकरें नही खायी थीं।

महेश कुमार भारती
व्यास बाँध
तलवाडा टाउनशिप
पंजाब